संवाद


"कॉलेज की दहलीज पर नई पीढ़ी"


स्कूल से निकलकर कॉलेज में जो पीढ़ी आ रही हैं, उनके आवेदन-पत्रों की जांच और उनके विषय-आवंटन का कार्य करने के बाद एक विशेष चिंता ने मन को जकड़ लिया। जिन विद्यार्थियों के 80% से ऊपर नंबर आए हैं, वे अभ्यर्थी और अभिभावक के अंतर को नहीं समझते। आवेदन-पत्र में जो अशुद्धियां हैं, वे 12वीं पास विद्यार्थी के लिए अक्षम्य है। विषयों के इंग्लिश और हिंदी नाम में वे अंतर नहीं कर पाते। उन्हें सब्जेक्ट के रूप में इंग्लिश अवश्य चाहिए किंतु वे इंग्लिश की स्पेलिंग सही नहीं लिख पाते। यहां तक कि Block letterऔर Small letter का अंतर उन्हें पता नहीं। 12वीं में पढ़े हुए विषय से वे पूर्णतया अनभिज्ञ से दिखे क्योंकि अधिकांश विद्यार्थी सब्जेक्ट-सेलेक्शन के लिए साथ में भाई या पिता किसी को ले आते। उनके विषय-चयन का एकमात्र आधार होता है कि इससे नौकरी लग जाएगी। विषय में रुचि या गति उनके लिए कोई मायने नहीं रखती।


अपने फलों से वृक्ष जाना जाता है। विद्यार्थी के स्कूल के शिक्षकों से जब मैंने बात की तो पता चला कि अधिकतर स्कूलों में सभी विषयों के शिक्षक ही नहीं है। विषयों की अलग-अलग पढ़ाई तो दूर सभी विद्यार्थियों की सामूहिक कक्षाएं भी बहुत कम लगती हैं। गैर-शैक्षिक- कार्यों में शिक्षकों को इतना व्यस्त कर दिया गया है कि विद्यार्थियों की जड़ों को मजबूत बनाने का काम असंभव सा हो गया है। ऐसे विद्यार्थियों के शिक्षक और स्कूल दोनों अच्छे रिजल्ट के लिए पुरस्कार से सम्मानित भी हो चुके हैं।


ऐसी स्थिति में कॉलेज को दो काम करने चाहिए-एक तरफ इन विद्यार्थियों की जड़ों को मजबूत बनाने का काम और दूसरी तरफ कॉलेज लेवल की किताबों में गति बढ़ाने का काम। इसके लिए कॉलेज प्रोफेसरों को अपने निर्धारित विषय की कक्षाएं नियमित रूप से लेने के साथ अतिरिक्त कक्षाओं का प्रावधान किया जाना चाहिए। किंतु कॉलेज में क्लास-टीचिंग की उपेक्षा बढ़ती जा रही है और गैर शैक्षिक कार्यों की अधिकता दोगुनी होती जा रही है।


कॉलेज की डिग्री मिल जाने के बाद इन विद्यार्थियों को कहा जाएगा कि आपके पास डिग्री तो है किंतु योग्यता नहीं। योग्यता को लाने के नाम पर कुछ नवाचारों का प्रयोग किया जाता है;जिनमें विद्यार्थियों की जड़ों को सींचने का काम नहीं होता बल्कि उनके जीवन रूपी वृक्ष पर कुछ पत्तियां जो सूखती जा रही हैं,उन पर पानी डालने का काम किया जाता है। मसलन उन्हें इंग्लिश-स्पोकन का कोर्स कराया जाता है जबकि उनका इंग्लिश- ग्रामर का मौलिक ज्ञान पूर्णतया शून्य है। इससे उनकी सूखती हुई पत्तियां पानी पड़ने से और सड़ जाती हैं।


शिक्षा पूर्ण करने के बाद विद्यार्थी को लगता है कि हम घर के रहे न घाट के। लगभग 20 वर्षों के स्कूली और कॉलेज शिक्षा के बाद हाथ में जो कागज की डिग्री आई हैं, वह किसी काम की नहीं। ऐसा विद्यार्थी परिवार, शिक्षक , सरकार और समाज सबके प्रति गहरे असंतोष से भर जाता है। परिवार से शिकायत की अच्छे स्कूल में क्यों नहीं भेजा?; शिक्षक से शिकायत की अच्छी प्रकार से क्यों नहीं पढ़ाया?; सरकार से शिकायत कि पढ़ाने को शिक्षक और पढ़ने के बाद नौकरी क्यों नहीं दी?; समाज से शिकायत कि इसके बाद हम से क्या अपेक्षा रखते हो?


आखिर इसके लिए दोषी कौन? दुष्यंत साहब फरमाते हैं-


"इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके-जुर्म है,


आदमी या तो जमानत पर रिहा है या फरार।


अब किसी को भी नजर आती नहीं कोई दरार,


घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार।।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹