संवाद


"ड्रग-एडिक्शन -अमीरों की गरीब-मानसिकता"


'दम मारो दम,मिट जाए गम' -इस पुराने गाने की बोल ने ड्रग-एडिक्शन के मूल कारण में गम को रेखांकित किया था। किंतु समझ नहीं आ रहा कि आर्यन खान जैसे लोगों का गम क्या है? दौलत से लेकर शोहरत तक जिनके पैर चूमती हो, अधिकांशत:उन्हीं का नाम रेव-पार्टी से जुड़ता है। अन्यथा लाखों रुपए की एंट्री फीस देकर कौन गरीब ड्रग्स लेने को रेव पार्टी में जाएगा?


लेकिन अमीरी का भी अपना गम होता है ,जो सबको मालूम नहीं होता क्योंकि अपना देश गरीबों का देश है। जिन्हें विरासत में दुनिया की हर चीज नसीब से मिल जाती हैं, वे अंदर से इतने खाली और खोखले हो जाते हैं कि स्वयं को भरने के लिए नशे की शरण में चले जाते हैं, यदि उन्हें परवरिश के नाम पर मां-बाप द्वारा समय व ध्यान के बदले सिर्फ पैसे दिए जाएं।


शाहरुख खान का एक इंटरव्यू मीडिया में वायरल हो रहा है जिसमें उन्होंने इच्छा जताई थी कि उनका बेटा आर्यन हर वह गलत काम करे जो वे स्वयं अपनी जवानी में नहीं कर सके, चाहे वह ड्रग्स हो या सेक्स। इतने बड़े कलाकार द्वारा एक पिता के रूप में अपने बेटे के लिए इस प्रकार की सोच रखने और सार्वजनिक रूप से उसे प्रकट करने पर मैं काफी हैरान हो गया; भले ही यह लाइट-मूड में कही गई बात हो। क्योंकि हम सभी अपनी संतति को इस प्रार्थना के साथ बड़ा करते हैं कि-


'हम चले नेक रस्ते पर हमसे ,


भूलकर भी कोई भूल हो न


इतनी शक्ति हमें देना दाता,


मन का विश्वास कमजोर हो न'


अस्तित्व का एक बड़ा अनूठा नियम है,जिसमें कहा गया है कि काफी सोच-विचार कर कोई ख्वाहिश करना क्योंकि परमात्मा यदि सुन ले तो वह पूरी हो जाती है। लगता है-शाहरुख की वह मुराद अल्लाह ने सुन ली।


मेरे दिल की ख्वाहिश है कि परमात्मा हमारी हर मांग को पूरी न करे। क्योंकि हमें यह भी पता नहीं कि कौन सी मांग इतने बड़े दरबार में रखी जाए।


"गर हर दुआ कुबूल हो जाए ,


आदमी बे-उसूल हो जाए।"


बॉलीवुड एक्टर संजय दत्त के ड्रग-एडिक्शन के कारण मां-बाप (सुनील दत्त और नरगिस दत्त)को इतनी बड़ी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था तथा स्वयं संजय दत्त को जेल की सलाखों के पीछे काफी समय तक रहने की पीड़ा झेलनी पड़ी थी, जिसकी कोई इंतिहा नहीं। क्योंकि नशे के कारण होश खोने के बाद व्यक्ति कितना गिर सकता है और उसके तार किससे जुड़ जाते हैं,इसका उसे भी पता नहीं होता।


भारत में एक तरफ करोड़ों गरीबों के युवा बच्चे हैं,जो अच्छी शिक्षा और एक छोटी नौकरी के लिए तरस रहे हैं और दूसरी तरफ ऐसे अमीरों के बच्चे भी हैं जो पाप और अपराध के नए-नए तरीके ढूंढ रहे हैं।


अब समय आ गया है कि समाज अपने आइकॉन को बदले। रील लाइफ के हीरो की जगह रियल लाइफ के हीरो को अपने हृदय में स्थान दे।


एक तरफ गरीबी कलाम जैसे शिक्षित और संस्कारित व्यक्तित्व को पैदा करती हैं तो दूसरी तरफ अमीरी आर्यन जैसे भटके हुए युवक को। यद्यपि मैं गरीबी का पक्षधर नहीं हूं क्योंकि अभाव के कारण कई प्रतिभाएं खिल नहीं पातीं किंतु शिक्षा और संस्कार देने वाली गरीबी यदि नसीब में आ जाए तो भटकाने वाली अमीरी से मैं उसे बेहतर मानता हूं।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹