आत्मशक्ति-जागरण की रात्रि
October 7, 2021संवाद
"आत्मशक्ति-जागरण की रात्रि"
नवरात्रि का उत्सव भक्तिभावपूर्ण माहौल में साधारण लोगों के लिए नाच-गान और घूमने- फिरने का एक अवसर होता है किंतु असाधारण लोगों ने इसे साधना का शुभ-अवसर माना है।
"या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः"
शक्ति के आह्वान का यह पर्व मां-दुर्गा के नौ रूपों की आराधना से जुड़ा हुआ है।
मेरे जेहन में तो दुर्गा पूजा के नाम पर बिहार-बंगाल में बड़े-बड़े पंडालों में बनी बड़ी-बड़ी मूर्तियां ही बसी हुई हैं, जिसमें कई भुजाओं वाली माता राक्षसों का वध करती हुई दिखाई जाती हैं। अब पता चल रहा है कि ये मूर्तियां तो बाहरी प्रतीक-मात्र हैं।
असल बात यह है कि मनुष्य के अंदर ही सारी शक्तियां छुपी हुई हैं। जिन शक्तियों पर ध्यान जाता हैं, वे शक्तियां जागृत होने लगती हैं।
ऐसा लगता है कि आज के युग का ध्यान धन-शक्ति और पाशविक-शक्ति पर सर्वाधिक हैं। अतः जितना धन बढ़ता जा रहा है,उतना ही जगत में अनाचार भी बढ़ता जा रहा है।
आत्मिक-शक्ति की ओर हमारा ध्यान गया ही नहीं। एटम की शक्ति का हमने विनाश तो देख लिया किंतु आत्मिक-शक्ति का हमने सृजन नहीं देखा।
पदार्थ की शक्तियों से विज्ञान ने परिचय कराया और पूरी दुनिया अनेक प्रकार की सुविधाओं से युक्त हो गई। परमात्मा की शक्तियों से परिचय कराने वाला धर्म साधारण लोगों की समझ में जल्दी नहीं आता; अतः सारी सुविधाओं के होते हुए भी आनंद नहीं आया।
आनंद तो आत्मा का गुणधर्म है। आत्मा जितनी दिव्यता और पवित्रता की ओर बढ़ती चली जाती हैं,उतना ही जीवन में आनंद बढ़ता चला जाता है।
नवरात्रि उस आत्मा की शक्ति से परिचय कराकर परमात्मा अर्थात् मां से जोड़ सकती है; क्योंकि मूलशक्तिस्वरूपा मां के बिना जन्म व जीवन संभव ही नहीं हैं।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे
नवरात्रि की मंगलकामना🙏🌹