संवाद


"मनोचिकित्सा की चुनौती"


10 अक्टूबर 'विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस' के कारण हमारा ध्यान उस ओर जाता है,जिसे हम नजरअंदाज करते हैं। शारीरिक स्वास्थ्य की तो हम चिंता करते हैं किंतु मानसिक स्वास्थ्य की उतनी ही उपेक्षा करते हैं।


अब हर शिक्षा-संस्थान में मेंटल हेल्थ कमेटी का गठन कर दिया गया है। इसका मतलब है कि शारीरिक स्वास्थ्य की तरह मानसिक स्वास्थ्य भी एक विशेष चुनौती बन चुका है। पश्चिमी देशों में शारीरिक बीमारियों के लिए डॉक्टर कम और मानसिक बीमारियों के लिए डॉक्टर ज्यादा होते जा रहे हैं। प्रतियोगितापूर्ण जीवन शैली के कारण बढ़ते पारिवारिक विघटन से हर चार में से एक व्यक्ति वहां डिप्रेशन का शिकार बन चुका है-


"हर तरफ, हर जगह,बेशुमार आदमी


फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी।"


भारत में भी 2015-16 का एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण बताता है कि हर 8 में से एक व्यक्ति किसी एक तरह की मानसिक बीमारी से प्रभावित है। इनमें से 2% लोग अर्थात ढाई करोड़ लोग ऐसे हैं जिन्हें मानसिक- चिकित्सा की जरूरत है।


इस तरह का सर्वेक्षण और रिपोर्ट भारत के लिए एकदम नयी है। भारत में किसी को दिल का रोगी बताया जाए तो वह डॉक्टर के पास जाने के लिए और हार्ट चेकअप के लिए एक बार सोचेगा किंतु किसी को मनोरोगी बताया जाए तो वह लड़ने पर आमादा हो जाएगा। मानो दिमाग का रोगी कह कर आपने उसे गाली दी हो।


लेकिन कोरोना महामारी के बाद शारीरिक स्वास्थ्य के बराबर ही मानसिक स्वास्थ्य की भी समस्या उभर आई है। अचानक दुनिया बदल गई, लोगों की नौकरियां छूट गई, हर कोई अपनी जान बचाने की चिंता में लग गया, लाखों लोग डॉक्टर और ऑक्सीजन के अभाव में तड़प-तड़प कर मर गए, मानव-गरिमा के अनुसार अंतिम संस्कार भी नसीब नहीं हुआ, जो लोग कोरोना से बच गए वे पोस्ट कोविड-इफेक्ट के कारण गहरी चिंता में डूब गए हैं; इन सभी कारणों ने मिलकर ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि हर एक व्यक्ति गहरी चिंता में डूब गया है और अवसाद का शिकार होता जा रहा है। ऐसे में मनोचिकित्सक और मनोचिकित्सा की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गई है।


भारतीय परंपरा में आधिभौतिक,आधिदैविक और आध्यात्मिक दुखों से निवृत्ति के लिए ज्ञानी-ध्यानी गुरुओं का सहारा लिया जाता था। इन्हीं अर्थों में बुद्ध ने अपने आपको वैद्य कहा है। कहानी कहती हैं कि जब एक स्त्री का एकलौता पुत्र मर गया तो वह पागल होकर बुद्ध के चरणों में अपने बेटे को जिंदा करने के लिए लोटने-पोटने लगी। बुद्ध ने कहा कि तेरे बेटे को मैं जिंदा कर दूंगा; बस तू उस घर से एक मुट्ठी चावल मांग कर ला,जिस घर में कभी कोई मौत नहीं हुई हो। वह स्त्री दौड़ी। चावल देने को तैयार बहुत मिले किंतु ऐसा एक भी घर नहीं मिला,जिसमें कोई मौत न हुई हो।


कहते हैं कि जीवन के इस चरम सत्य का ज्ञान आते ही वह आकर बुद्ध के चरणों में गिर गई और संन्यासिनी बन गई। वह इस मानसिक दुख से टूटकर पागल नहीं हुई बल्कि मन के पार निकल कर बौद्ध-भिक्षुणी बन गई।


आज के जमाने में ऐसी ज्ञान की बातें किसी को भी पचती नहीं और अच्छी भी नहीं लगती। विज्ञान ने ऐसी खोज कर ली है कि किस हार्मोन के स्राव से चिंता ज्यादा घिरती है और किस दवा से चिंता कम की जा सकती हैं।


निश्चित ही विज्ञान की इन खोजों और दवाओं की बहुत उपयोगिता है। किंतु भारतीय चिंतना यह है कि मन अपने आप में एक बीमारी है और जब तक व्यक्ति मन के पार नहीं चला जाए अर्थात "अमन" नहीं हो जाए तब तक स्वस्थ नहीं हो सकता। मन के पार जाने के लिए ही ध्यान का विज्ञान यहां विकसित हुआ।


सरकार से मांग की जा रही है कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए विशेष बजट उपलब्ध कराए। जिस देश में शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ही पर्याप्त बजट नहीं हो ,वहां मानसिक स्वास्थ्य के लिए बजट की आशा करना कुछ जरूरत से ज्यादा है।


लेकिन प्रकृति के साथ जीना और परमात्मा पर अपने आप को छोड़ना भारतीय परंपरागत जीवन शैली की ऐसी विशेषता है,जिसके कारण बहुत सारी मानसिक- बीमारियों से निजात पाया जा सकता है-


"मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे


बाकी न मैं रहूं और न मेरी आरजू रहे"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹