संवाद


"परिस्थिति से ज्यादा महत्वपूर्ण है मन:स्थिति"


जिस कश्मीर के बारे में सम्राट जहांगीर ने कहा था कि पृथ्वी पर यदि कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है। उसी कश्मीर के बारे में आतंकियों द्वारा मारे गए शिक्षक कश्मीरी पंडित दीपक चंद के परिजन ने कहा कि कश्मीर स्वर्ग नहीं, नर्क है।


अपनी आधी सैलरी गरीब बच्चों पर खर्च करने वाली और अनाथ मुस्लिम बच्ची को गोद लेकर अच्छी परवरिश हेतु हर महीने एक मुस्लिम परिवार को ₹15000 देने वाली स्कूल की सिख प्रिंसिपल सुपिंदर कौर जहां स्कूल में ही आईडी देखकर गोलियों से भून दी जाती हैं, उस कश्मीर को स्वर्ग कैसे कहा जाए?


भौगोलिक दृष्टि से समृद्ध कश्मीर जैसे प्रदेश में तो ऋषि-मुनि तपस्या हेतु जाया करते थे और आध्यात्मिक ऊंचाइयों को प्राप्त कर मानव कल्याण हेतु विराट दृष्टि का मंत्र देते थे; तभी तो इसे स्वर्ग कहा जाता था। आज मानसिक दृष्टि से संकुचित तथा प्रदूषित होकर वही कश्मीर नरक बन गया है।


कश्मीर की सुंदर वादियों में रहने वाले और सुंदर तन वाले लोगों के मन में ऐसा क्या भर दिया गया कि जिसके कारण उसका डिवाइन (Devine)स्वरूप डेविल (Devil)रूप में परिवर्तित हो गया?


दरअसल आत्मा के जन्म लेते ही सबसे पहला लेबल उसे लड़का या लड़की होने का लगाया जाता है जो कि एक प्राकृतिक विभाजन है। किंतु इसके बाद के सारे लेबल अप्राकृतिक,मानसिक और राजनीतिक हैं। चाहे वह हिंदू और मुस्लिम के रूप में धर्म का लेबल हो, चाहे ब्राम्हण और शूद्र के रूप में जाति का लेबल हो, चाहे बाहरी और भीतरी के रूप में क्षेत्र का लेबल हो, चाहे वह हिंदी और गैर हिंदी के रूप में किसी भाषा का लेबल हो, चाहे हिंदुस्तान और पाकिस्तान के रूप में किसी राष्ट्र का लेबल हो; इनमें से किसी भी लेबल को लगाने के बाद उन्हें एक दूसरे के विरुद्ध भड़काना और हिंसा कराना आसान हो जाता है-


"फिर रहा है आदमी भुला हुआ,भटका हुआ


एक न एक लेबल हर एक माथे पर है लटका हुआ।"


यही भूला हुआ और भटका हुआ आदमी किसी शिक्षालय में प्रवेश कर जाता है और शिक्षक की आईडी देख कर उसे गोलियों से भून डालता है। इतना आसान नहीं होता किसी आत्मा द्वारा दूसरे की आत्मा की हत्या करना, और वह भी तब जब कोई भी व्यक्तिगत दुश्मनी की पृष्ठभूमि न हो; सिवाय इसके कि मन को तैयार किया गया कि वह दूसरे धर्म,जाति,क्षेत्र या भाषा का है, अतः इसे मार दो। यह भी एक प्रकार की शिक्षा से हुआ है जिसे उपनिषद् के ऋषि अविद्या कहते हैं।


अविद्या द्वारा मन में एक घृणा का भाव डाला जाता है,जिसके द्वारा आतंकी मन तैयार हो जाता है।


इसके विपरीत विद्या द्वारा मन के ऊपर आरोपित सारे लेबल को साफ कर दिया जाता है, और प्रेम तथा करुणा का भाव मन में भरा जाता है- विद्यया अमृतम् अश्नुते


यही कारण था कि भारतीय संस्कृति में प्रारंभिक-शिक्षा ज्ञान के शिखर पर पहुंचे हुए विश्वामित्र देते थे और शिक्षा ग्रहण करने वाला मन एकदम कोरे कागज की तरह होता था जिस पर "वसुधैव कुटुंबकम्" का विराट मंत्र गुरु लिख देता था। जिसके परिणामस्वरूप राम का जन्म हो जाता था जो सिर्फ राजकुमार नहीं बल्कि वंचितों और शोषितों पर करुणा करने वाले करुणानिधान बन जाते थे।


आज विश्वामित्र की विराट ब्रह्मविद्या की जगह मासूमों के मन में जहर डालने वाली धर्मांध-तालीम तथाकथित शिक्षा-केंद्रों पर दी जा रही हैं जिसके कारण कश्मीरियों का दैवीय स्वरूप शैतानी रूप में परिवर्तित हो गया है।


शिक्षालय में घुसकर आईडी देखने के बाद शिक्षक की हत्या विद्या और अविद्या के अंतर को गहराई से समझने के लिए हम सभी को मजबूर कर रही है। और यह भी संदेश दे रही है कि शिक्षा और शिक्षक पर निर्भर करता है कि कोई जमीन स्वर्ग बनेगी या नर्क। क्योंकि सुंदर जमीन पर सुंदर तन में जन्म होने के बावजूद सुंदर-मन का निर्माण नहीं हुआ तो असुंदर-मन स्वर्ग को भी नर्क बना लेगा-


"मन एवं मनुष्याणाम् कारणम् बंधमोक्षयो:"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे


अश्रुपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि🙏🌹