सवाल मातृ-ऋण का
October 12, 2021संवाद
"सवाल मातृ-ऋण का"
"चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है". . गाने के इस बोल को गुनगुनाते-गाते हुए दुर्गा-माता के दर्शन के लिए भक्तों की भारी भीड़ मंदिरों और पंडालों की ओर जाने लगी है। चल रही आरती और गरबा में लोगों के उत्साह का कोई पारावार नहीं। देर रात तक नाचते-गाते हुए माता के प्रति अपने प्रेम को जताते हुए लोग अघाते नहीं हैं।
इन्हें गौर से देखता हूं तो सोचता हूं कि पत्थर की मूर्ति वाली माता में इतनी आस्था है तो अपनी माता के प्रति इनकी आस्था कितनी ज्यादा होती होगी?
'मातृ देवो भव' वाली संस्कृति में असली माता के प्रति जो आदर और श्रद्धा हैं,वही तो मूर्तियों वाली माता में प्रतिबिंबित हो रही है।
किंतु मेरी धारणा को गहरी चोट लगी। भोपाल में "अपना घर वृद्धाश्रम" चलाने वाले सचिव विश्वजीत दुबे के हवाले से समाचार पत्र में खबर पढ़ी कि पिछले 5 सालों में 60 वृद्धों के अंत्येष्टि-संस्कार में सम्मिलित होने से बेटे-बेटियों या घर वालों ने मना कर दिया और बोले कि अंत्येष्टि संस्कार का वीडियो बनाकर भेज देना। यहां तक कि तेरहवीं और तर्पण संस्कार भी आश्रम वाले कोअपने खर्चे से करना पड़ता है।
काफी देर तक गुमसुम बैठा रहा। फिर अचानक एक विचार आया कि मूर्ति वाली माता के सामने में कोरोना के खतरे के बावजूद जो भारी भीड़ जमा हो रही है और अपनी भक्ति-भाव दिखा रही है, वह कहीं असली माता की उपेक्षा से उठे हुए आत्म-अपराध के भाव का प्रायश्चित तो नहीं है?
जिस गर्भ से जन्म पाया और जिस माता ने अपनी छाती का दूध पिलाया तथा रात भर जाग-जाग कर लोरियां सुना-सुना कर बड़ा किया, उस माता को छोड़ देना तो मुश्किल है ही किंतु उसके अंतिम संस्कार में भी शामिल न होना तो असंभव सा प्रतीत हो रहा है क्योंकि मातृऋण से कभी भी और कुछ भी करके उऋण नहीं हुआ जा सकता-
"फिर कभी देखा नहीं मां के गले में हार को
भूख के दिन बिक गई जो वह निशानी याद है।
वक्त से पहले ढली जो वह जवानी याद है,
मुझको अपने जिंदगी की हर कहानी याद है।।"
लेकिन आधुनिक शिक्षा और जीवन शैली ने जिंदगी को एक रेस बना दिया है, जिसमें व्यक्ति दौड़ बहुत रहा है किंतु कहीं पहुंच नहीं रहा है।
युवाओं की नौकरी दूर देश-प्रदेश में लग रही है और पति-पत्नी दोनों जॉब कर रहे हैं तो निश्चितरूपेण मां-बाप को साथ रखने की अनुकूल परिस्थितियां नहीं होती है। मां-बाप भी कई अन्य कारणों से साथ रहना नहीं चाहते; किंतु इसका मतलब कदापि नहीं है कि मां-बाप वृद्धाश्रम में दम तोड़ें और बेटे-बेटी अंत्येष्टि संस्कार का वीडियो मंगाएं।
ऐसी घटनाएं निश्चिरूपेण भारतीय समाज में अपवाद की श्रेणी में आती हैं किंतु पतन इतनी तेजी से होता है कि अपवाद सामान्य बनने लगता है। इसलिए उनका स्वत:संज्ञान सभी को लेना चाहिए।
बुजुर्गों के प्रति दुर्व्यवहार की घटनाएं समाचारपत्रों की जब सुर्खियां बनने लगे और पारिवारिक रिश्तो में अदालतों का हस्तक्षेप व निर्णय जब बढ़ने लगे तो मूल्य-आधारित जीवन जीने वाले समाज को इसकी गहरी चिंता भी लेनी चाहिए और इस पर गहरा चिंतन भी करना चाहिए।
मेरा अनुभव कहता है कि भारतीय मन में परिवार की जड़ें बहुत गहरी बसी हुई हैं। लॉकडाउन के दौरान परिवार की अहमियत का गहरा एहसास हुआ। खासकर मेट्रो शहरों में पसंद के मां-बाप को गोद लेने का नया चलन शुरू हो गया है। अभी तक बच्चे को गोद लेने की बात तो सुनी गई थी किंतु एकल परिवार वाले संपन्न लोगों ने जब देखा कि अकेलेपन से उपजे अवसाद ने जीवन पर चारों ओर से शिकंजा कस दिया है और बुजुर्गों के बिना उनके बच्चों को संस्कार देने वाला कोई नहीं बचा है तो वे वृद्धाश्रम से मां-बाप गोद लेने लगे हैं। इस नई अवधारणा पर आधारित फिल्म "हम दो हमारे दो" अगले महीने रिलीज होने वाली है।
मां तो परिवार की धुरी होती हैं।उनके प्रति बढ़ रही उपेक्षा व उदासीनता के भाव के पीछे की परिस्थिति और मन:स्थिति को समझने की कोशिश होनी चाहिए जिससे इस प्रवृत्ति को बढ़ने से रोका जा सके।इसके लिए दुर्गापूजा से अच्छा अवसर दूसरा नहीं हो सकता-
"या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹