संवाद


"विश्व विद्यार्थी दिवस और विजयादशमी"


15 अक्टूबर के इस अद्भुत संयोग दिवस पर यह ध्यान देने की बात है कि विद्या द्वारा ही विजय की प्राप्ति होती है। किंतु देखने में यह आ रहा है कि जैसे-जैसे विद्यालय बढ़ रहे हैं,वैसे-वैसे विध्वंसात्मक गतिविधियां भी बढ़ रही हैं जो हमें अशांति और पराजय की ओर ले जा रही हैं। इसका मतलब है कि राम की विद्या और रावण की विद्या में जरूर कुछ अंतर होगा। दरअसल हमारी संस्कृति में जो विनम्रता को बढ़ाए वही विद्या है और जो अहंकार को बढ़ाए, वह अविद्या है। सर्वसार उपनिषद के अनुसार-


यया अभिमानो निवर्तते सा विद्या


या अभिमानम् कारयति सा अविद्या


राम और रावण दोनों ने शक्ति की उपासना की किंतु राम की शक्ति उपासना आत्मा के आविष्कार के लिए थी और रावण की शक्ति उपासना अहंकार के परिष्कार के लिए थी। अहंकार सबको कुचलता चला गया किंतु आत्मशक्ति से सभी संभलते चले गए। तभी तो कहावत बनी- निर्बल के बल राम। राम आंतरिक सद्गुणों के प्रतिनिधि हैं और रावण दुर्गुणों का।


राम रावण के बीच का यह संघर्ष हर व्यक्ति में सतत चल रहा है। किंतु जिसे विद्या प्राप्त हो जाती है वह राम के रास्ते पर आगे बढ़ जाता है।


भारत रत्न कलाम साहब से इसका अच्छा उदाहरण और कहां मिलेगा। गरीब परिवार में जन्म लेकर अनेक प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद विद्या द्वारा वे अपने सद्गुणों को बढ़ाते चले गए और विजय के मार्ग पर अग्रसर होते गए।


एक मछुआरे का बेटा बड़े-बड़े पदों को सुशोभित करते हुए महामहिम की कुर्सी तक पहुंचता ही नहीं है, बल्कि राष्ट्रपति-भवन को भी विद्यालय में तब्दील कर जगत को एक नया संदेश दे जाता है। और अंतिम सांस तक विद्यादान करते हुए मृत्यु पर विजय प्राप्त कर अमृत ( अमरपद )को पा लेता है। उनकी विद्या के कारण हर कोई उन्हें एक दिव्य इंसान के रूप में याद करता है ; हिंदू या मुसलमान के रूप में नहीं।


अपनी विजय यात्रा का सारा श्रेय वे अपने शिक्षकों को देते हैं। वे बताते हैं कि उनके शिक्षक क्लास में पढ़ाने के बाद विद्यार्थियों को रामेश्वरम के तट पर ले जाकर उड़ते पंछियों को दिखाकर उड़ने की कला बताते थे।


काश! ऐसा शिक्षक हर विद्यार्थी को नसीब हो और हर विद्यार्थी कलाम की तरह ज्ञान का प्यासा और विनम्र हो।


आज का दुर्भाग्य यह है कि विश्वगुरु बनने के रास्ते पर विजय की कामना करने वाला भारत अपने विद्यार्थियों को पर्याप्त शिक्षक नहीं दे पा रहा है। और जो थोड़े बहुत शिक्षक हैं,उन्हें विद्या देने के अलावा अन्य बहुत सारे कार्यों में उलझा रखा है।


ऐसे में विद्यार्थी अपने दुर्गुण रूपी रावण को परास्त कर राम रूपी प्रेम- करुणा आदि सद्गुणों को विजयी कैसे बना पाएंगे?-


हुई आरती की तैयारी शंख खोज या सीप।


एक बची चिंगारी चाहें चिता जला या दीप।।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे


विजयादशमी व विद्यार्थी दिवस की शुभकामना🙏🌹