कुचलने और काटने की मानसिकता
October 16, 2021संवाद
"कुचलने और काटने की मानसिकता"
हिटलर के हिंसक-मन और महात्मा के अहिंसक-मन की तैयारी में एक विशेष प्रकार का अंतर होता है।एक बार गांधीजी के लिए सरदार पटेल पानी गर्म कर रहे थे। पानी उबलने लगा तो गर्म भाप ऊपर उठने लगा। गांधी जी ने पटेल को कहा कि आप इसे ढक दें ताकि गर्म भाप ऊपर न जाए। पटेल ने कहा कि इसकी क्या जरूरत है? गांधी ने कहा कि हवा में कुछ जीवाणु रहते हैं, गर्म भाप से उनके प्रति अनजाने ही हिंसा हो जाएगी।
व्यक्तित्व की सबसे गहरी परत भाव-जगत है। गांधी का अहिंसा का भाव ऐसा था कि सूक्ष्म जीवाणु के प्रति भी अनजाने में भी हिंसा ना हो जाए ,इसके प्रति वे सजग थे। व्यक्तित्व की दूसरी परत विचार- जगत की है। शत्रुओं के प्रति भी गांधी हिंसक विचार से परहेज करते थे। तब जाकर गांधी का कर्म-जगत ऐसा निर्मित हुआ कि लाखों लोग उनके साथ अहिंसा के रास्ते पर चल पड़े और चौरीचौरा कांड की एक हिंसक घटना के कारण उन्होंने इतना बड़ा असहयोग आंदोलन शिखर पर पहुंचने के बावजूद वापस ले लिया।
उस समय गांधी का यह निर्णय सभी बुद्धिमानों को बेवकूफी भरा लगा था। किंतु आज समझा जा सकता है। क्योंकि हिंसक बंटवारे के बाद जो भारत को आजादी प्राप्त हुई है, उस हिंसा की मानसिकता आज सबसे बड़ी समस्या के रूप में सामने आ रही है।
लखीमपुर-खीरी हो या छत्तीसगढ़ या सिंघु बॉर्डर ; सर्वत्र कुचलने और काटने-पीटने के जो नृशंस कृत्य दिखाई दे रहे हैं,वो भाव और विचार में जो चल रहे हैं, उसकी अभिव्यक्ति-मात्र है।
कामुक और हिंसक दृश्यों को दिखाकर सबसे पहले भाव-जगत को प्रदूषित किया जा रहा है, इसके बाद घृणा के विचारों को परोसकर लोगों को एक दूसरे के प्रति हिंसा के लिए उकसाया जा रहा है। तत्पश्चात ऐसी घटनाएं सामने आने पर हो- हल्ला मचाया जा रहा है।
ऐसी घटनाएं अचानक रोकी नहीं जा सकती किंतु इनको कम करने का प्रयास तो अवश्य किया जा सकता है।
सरकार और समाज की अग्रिम पंक्ति में बैठे हुए लोगों का एक-एक कर्म ही नहीं बल्कि एक- एक विचार अहिंसक होना चाहिए। सार्वजनिक जीवन जीने वाले अग्रगण्य लोगों को यह होश होना चाहिए कि वे क्या बोल रहे हैं और क्या कर रहे हैं। क्योंकि उनके लाखों-करोड़ों अनुयायी उन्हीं मार्गों पर चल निकलेंगे।
गांधी का सिर्फ नाम लेने से यह परिवर्तन नहीं होगा। बल्कि गांधी की तरह प्रार्थना,व्रत,उपवास इत्यादि उपायों का सहारा लेकर अपने भाव-जगत तक को शुद्ध रखने का प्रयास करना होगा। उसी से अहिंसक-विचार बनेंगे और अहिंसक-कर्म के रूप में उसकी अभिव्यक्ति होगी।
आज बड़े-बड़े लोगों द्वारा गांधी और पटेल की बड़ी-बड़ी मूर्तियां बनवाकर अहिंसा और एकता के पाठ सिखाने का प्रयास किया जा रहा है। किंतु अहिंसा और एकता के भाव-जगत व विचार-जगत में रहने वाले जीवंत लोगों का साक्षात् दर्शन नहीं होता।
क्या भारत में जीवंत गांधी और जिंदा पटेल की कमी हो गई है या उन्हें अंधेरे में रख दिया गया है?
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹