संवाद


"विदुर और विकर्ण की जरूरत"


झुंझुनूं के सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल द्वारा सातवीं क्लास की छात्रा के साथ किया गया दुराचार तो हैरान करने वाला है ही, किंतु उसी स्कूल की दो शिक्षिकाओं द्वारा उस बालिका के घर जाकर धमकाना और उसके मोबाइल से आरोपी प्रिंसिपल द्वारा भेजे गए अश्लील मैसेज को डिलीट करने का मामला और भी ज्यादा शर्मसार व परेशान करने वाला है।


पाप को रोकने की बात तो दूर अब अपराधी को सहायता पहुंचाने वाले आत्महीन लोग समाज में ज्यादा होते जा रहे हैं। यदि शिक्षालय में भी ऐसा होने लगे तो समाज का ताना-बाना बिखर जाएगा।


द्यूतक्रीड़ा में हराने के बाद जब द्रौपदी के चीर हरण का आदेश दुर्योधन ने दिया तो उसका सबसे पहला विरोध विदुर ने किया और दूसरा विरोध कौरवों में से एक विकर्ण ने किया।


परिवार,समाज और शिक्षालय तीनों के बदलते हुए स्वरुप पर यह विचार करने का समय है।


पहले परिवार में किसी के भी आचरण में कोई दोष दिखने पर रोकने-टोकने वाले बहुत लोग होते थे। समाज भी अच्छे लोगों की प्रशंसा और बुरे लोगों की भर्त्सना किया करता था। शिक्षालय तो परिवार और समाज के लिए मंदिर समान होते थे और शिक्षक की विद्यार्थी के साथ समाज पर भी अच्छी पकड़ होती थी।


आज परिवार एकल हो गया, जिसमें कोई रोकने-टोकने वाला नहीं। समाज की पकड़ बहुत ढीली हो गई। शिक्षालय सिर्फ सिलेबस पूरा करने का काम करने लगे और जीवन-निर्माण के केंद्र नहीं रहे। ‌


इसके बावजूद आज भी शिक्षक विद्यार्थियों को पढ़ाते समय उसके जीवन से भी जुड़ ही जाता है और अपने आचरण तथा ज्ञान द्वारा जीवन का मार्गदर्शन करता है।


इसमें उत्थान पतन का दौर चलता रहता है। अतः योगभ्रष्ट शब्द हमारे सुनने में आता है, भोगभ्रष्ट नहीं।


यदि कोई योगी भ्रष्ट होता है तो उसके साथी साधक उसको गिरने से सावचेत करते हैं।


यहां तो सावधान करने की जगह बुरे काम में एक सीमा के बाहर जाकर सहायता करने का अपराध किया गया है।


मानव सुलभ कमजोरियां सबमें होती हैं। शिक्षालय में गलती करने पर परिवार(मां-बाप) को चेताया जाता है। यदि परिवार द्वारा समझाने-बुझाने पर भी कोई अपने आप को परिवर्तित नहीं करता है तो शिक्षालय उसे बाहर निकाल देता है। यदि उसका आचरण समाज में भी आपत्तिजनक होता है तो समाज उसे बहिष्कृत कर देता है।


समाज की यह पकड़ इधर बहुत कमजोर हुई है। अब तो समाज दुराचारियों और भ्रष्टाचारियों को बहिष्कृत करने की जगह पुरस्कृत करने लगा है। इसी समाज में हमारे बच्चे-बच्चियां बड़े हो रहे हैं।


इसी समाज की मूल्य चेतना को जगाने के लिए शिक्षालय होते हैं। जब राह दिखाने वाला ही राह भटकाने वाला हो जाए तो क्या होगा?-


"हुए इस तरह खम जमाने के हाथों


कभी तीर थे अब कमां हो गए हम।


न रहवर कोई , न रफीके-सफर है


यह किस रस्ते पर रवां हो गए हम।।"


एक तो शिक्षकों की भारी कमी, दूसरा शिक्षकों को गैर-शैक्षिक कार्यों में नियोजन से भावी पीढ़ियां बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। उस पर से शिक्षकों पर ऐसे इल्जाम से शिक्षा जगत की चूलें हिल गई हैं।


कारण यह है कि सफेद और साफ-सुथरे वस्त्र पर एक काला छींटा भी बहुत बड़ा और स्पष्ट दिखाई देता है।


जब से राजनीति शिक्षाजगत में हावी होने लगी तब से सच्चरित्र व समर्पित शिक्षक हाशिए पर चले गए हैं।


राजनीति में दबदबा रखने वाले शिक्षक के किसी भी अनुचित कार्य का विरोध करने का कोई साहस नहीं कर पाता। अंतरात्मा की आवाज पर विरोध के स्वर उठाते ही सच्चा शिक्षक राजनीति का शिकार हो जाता है।


अब शिक्षक-समाज को सोचना है कि जिस प्रकार से कश्मीर में शिक्षालय में घुसकर शिक्षक की हत्या करने पर और रीट परीक्षा के दौरान प्रशासनिक अधिकारी द्वारा शिक्षक के साथ दुर्व्यवहार करने पर सभी शिक्षक-संगठनों ने समवेत स्वर से इसका विरोध किया, क्या वे उसी प्रकार का समवेत स्वर शिक्षालव में मूल्य चेतना के लिए उठाएंगे?


यदि हम किसी पार्टी-लाइन से अलग हटकर अच्छे शिक्षकों को नहीं बचा पाएंगे और गलत का विरोध करने वाली आत्मा को नहीं जगा पाएंगे तो शिक्षक की गौरव- गरिमा धूल-धूसरित हो जाएगी।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹