धर्म क्या है?,अधर्म क्या है?, शुभ क्या है? ,अशुभ क्या है?
October 22, 2021संवाद
क्या है? और क्या होना चाहिए?
'शुभ क्या है?'-यह दार्शनिक मीमांसा का एक प्रमुख प्रश्न रहा है। किसान संयुक्त मोर्चा के नेता श्री योगेंद्र यादव लखीमपुर खीरी कांड में मारे गए किसानों के घर तो गए ही, साथ ही शुभम मिश्रा के घर भी श्रद्धांजलि व्यक्त करने चले गए जो कि बीजेपी कार्यकर्त्ता थे। इस पर संयुक्त किसान मोर्चा ने 1 महीने के लिए उन्हें अपने मोर्चे से निलंबित कर दिया।
इस निलंबन पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रो. योगेंद्र ने कहा कि निलंबन का यह फैसला सर-माथे पर लेता हूं क्योंकि अन्य नेताओं को इसके लिए विश्वास में नहीं लिया; किंतु मैं तो अपनी सांस्कृतिक परंपरा और वैयक्तिक मूल्यों के कारण शुभम के घर जाना उचित समझा।
उन्होंने यह भी कहा कि 'श्रद्धांजलि व्यक्त करने हेतु विरोधी खेमे के घर जाना शुभ है या अशुभ ?'-इस पर समाज में चर्चा हो।
श्री राम ने अपने शत्रु रावण के युद्धभूमि में गिर जाने के बाद लक्ष्मण को उनसे राजनीति का ज्ञान प्राप्त करने हेतु भेजा था। इतना ही नहीं रावण के मरने पर उनके भ्राता विभीषण को ससम्मान अंत्येष्टि संस्कार हेतु आदेश भी दिया था।
इसी प्रकार से महाभारत युद्ध के पहले कौरवों और पांडवों ने मिलकर युद्ध के नियम बनाए। उद्देश्य इतना ही था कि युद्ध भी धर्म के अनुसार लड़ा जा सकता है। यह बात और है कि उन नियमों को तोड़कर युद्ध में हर प्रकार के छल-कपट का प्रयोग किया गया। अभिमन्यु का वध हो या द्रोणाचार्य का वध दोनों तरफ से अधर्म का रास्ता अपनाया गया।
लेकिन जब कर्ण ने सूर्य के अस्त होते ही अपने शत्रु अर्जुन पर प्राणांतक बाण चलाने से अपने को रोक लिया तो श्री कृष्ण ने भी सूर्यपुत्र के सम्मान में सर झुका दिया। स्वयं कर्ण का सारथी शल्य उससे पूछता है कि युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव को पकड़ने के बाद तुम मार सकते थे किंतु क्यों छोड़ दिया? उस समय कर्ण ने बहुत प्यारा जवाब दिया-
"समझोगे नहीं शल्य यह करतब नादानों का है
यह खेल,जीत से बड़े किसी मकसद के दीवानों का है।"
रहस्य यह था कि कर्ण ने माता कुंती को वचन दे रखा था कि अर्जुन के अलावा अन्य किसी भी पांडव का प्राण नहीं लेगा। इन्हीं मूल्यों के कारण कर्ण महाभारत का एक अविस्मरणीय योद्धा बन गया।
महाभारत युद्ध में किसी भी पक्ष के वीर के मारे जाने पर श्रद्धांजलि देने सभी जुटते थे।
राम-रावण और कौरव-पांडव का युद्ध तो जीवन मरण का प्रश्न था। फिर भी "धर्म क्या है?,अधर्म क्या है?, शुभ क्या है? ,अशुभ क्या है?"- इन प्रश्नों पर मंथन चलता रहा।
आज तो प्रश्न सिर्फ मुद्दे का है या ज्यादा से ज्यादा चुनाव का है; फिर भी जीवन के नैतिक मूल्यों को तिलांजलि दी जा रही हैं।
योगेंद्र जी का प्रश्न गहराई से विचार करने योग्य मुझे लगा। इससे उनके प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा, कोई जरूरी नहीं किंतु विचार करने से इतना जरूर पता चलेगा कि 'क्या है?' और 'क्या होना चाहिए??' (what is and what ought to be)-
"जहां चला करती थीं तलवारें भी ईमानदारी से,
वहां की अब कलम लाचार क्यों है सोचना होगा?
वफा की राह में वो बर्बाद क्यों है सोचना होगा
हमारा मर गया किरदार क्यों है सोचना होगा??"
शिष्य-गुरु संवाद से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹