संवाद


"गुरुकी इंतिहा"


होमवर्क नहीं करने पर स्कूल-संचालक के शिक्षक-बेटे द्वारा चूरू में सातवीं के छात्र को लात-घूंसों-डंडों से इतना पीटा गया कि उसकी सांसें उखड़ गईं।


"Spare the rod,spoil the child" मुहावरा कहता है कि शिक्षक की मार छात्र के लिए कल्याणकारी होती है। शिक्षक ही नहीं मां-बाप भी गलती करने पर बच्चों को मारते हैं किंतु मार ही नहीं देते हैं।


शिक्षक मनोज ने तो अपने क्रोध और गुरूर में विवेक खो दिया और बच्चे गणेश की जान ले ली। अन्यथा शिक्षक और मां-बाप का क्रोध छुपे रूप में करुणा का ही एक प्रकार होता है।


शिक्षालय में शिक्षक के अमर्यादित आचरण की खबरें कई दिनों से समाचार-पत्र में नियमित रूप से सुर्खियां बन रही हैं।


शिक्षक होने के नाते शर्म के मारे आंखें झुकी जा रही हैं। अचानक मेरी निगाह वैदिक-ग्रंथ (निरुक्त) की एक पंक्ति पर पड़ी जिसमें विद्या ने विद्वान से प्रार्थना की कि-"अनियंत्रित इंद्रिय और मन वाले कुटिल व्यक्तियों को मुझे कभी मत देना।"(असूयकायानृजवेअयताय न मा ब्रूया..)


काम-क्रोध-लोभ-मोह के साथ सबका जन्म होता है किंतु द्विज बनकर विद्या द्वारा इन नकारात्मक प्रकृति को सकारात्मक स्वरूप देने के लिए विद्यालय और गुरु होते थे।


कालक्रम से विद्यादान के माध्यम से धनार्जन की प्रवृत्ति बढ़ने पर शिक्षालय और शिक्षक अस्तित्व में बढ़ते चले गए।


शिक्षा के व्यवसायीकरण के आधुनिक दौर में स्कूल-संचालक और ट्यूटर ने प्रमुख स्थान ग्रहण कर लिया है जो टीचर कम मैनेजर ज्यादा होते हैं।


ज्ञान की प्यास शिक्षा को निर्भार बनाती है किंतु धन की प्यास ने शिक्षा को बहुत बोझिल बना दिया। हर स्कूल दूसरे स्कूल से प्रतियोगिता में आगे निकल जाने हेतु हर प्रकार के हथकंडे अपना रहा है।


शिक्षक के हाथों बच्चे की मौत के कारण यह घटना लाइमलाइट में आ गई अन्यथा मासूम इस धन-पिपासु और तनावग्रस्त शिक्षा-व्यवस्था में न जी रहे हैं और न मर रहे हैं, फिर भी हमारे कानों पर जूं नहीं रेंगती।


हम एक दुष्ट-चक्र के शिकार हो चुके हैं। कोई विकल्प होता तो अवश्य हर मां-बाप अपने जिगर के टुकड़े को वहीं भेजते।


किंतु कुछ जगहों पर कुछ विद्या-अनुरागी लोगों ने आशा के दीप जला रखे हैं। ऐसे लोग हृदय-प्रधान होते हैं और देने के भाव से भरे होते हैं।


बिहार में सुपर-थर्टी के संस्थापक प्रोफेसर आनंद कुमार ने गरीब किंतु मेधावी बच्चों के साथ जो सफल प्रयोग किया, वह किसी परिचय की मोहताज नहीं है। आईआईटी जैसी कठिन परीक्षा में अपने चुने हुए विद्यार्थियों को शत-प्रतिशत सफलता दिलाकर इस इंसान ने एक मिसाल रखी हैं।


यदि अच्छा शिक्षक मिल जाए तो विद्यार्थियों के लिए विषय और पुस्तक से अच्छा मित्र और ज्यादा आनंद देने वाली दूसरी चीज दुनिया में नहीं होती।


आखिर सुपर-थर्टी से आज तक किसी के सुसाइड करने की या किसी को मार देने की खबर क्यों नहीं आई? वहां से निकले हुए बच्चे अपनी सफलता के बाद अपने संस्थान में निशुल्क सेवा देने को अपना सौभाग्य क्यों समझते हैं?


मेरी नजर में सबसे पहले विद्यार्थी की योग्यता और क्षमता को पहचानने वाली आंखें चाहिए। उसके बाद उसे तराशने वाले उदार-हृदय व विशेषज्ञ- शिक्षक चाहिए।


हर बच्चा डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर और आईएएस तो नहीं बन सकता किंतु हर बच्चा एक अच्छा इंसान तो बन ही सकता है। फिर किसी भी स्किल को सीखकर अपना जीवनयापन अच्छी प्रकार से कर सकता है। बस जरूरत है जीवन निर्माण वाले केंद्र विकसित करने की और सोच बदलने की।


शिक्षक निकलता तो इसी समाज से हैं किंतु कीचड़ में कमल की भांति खिलने के कारण उसमें पथ-प्रदर्शन की अतिरिक्त क्षमता भी होती है।


अत:हर समाज सतत निगरानी से अच्छे शिक्षकों और शिक्षालयों को अपनी सुरक्षा और शक्ति भी दे तब शायद शिक्षालय को शर्मसार करने वाली घटनाएं कम होती जाएं और गौरव प्रदान करने वाली कहानियां बढ़ती जाएं-


आस्था का हर एक केंद्र डगमगा जाएगा


तब सहारा पाने कोई भी कहां जाएगा?


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹