संवाद


"चांद हमारे अंगना उतरे कोई तो ऐसी रैन मिले"


प्रेम की आंखें गजब होती हैं। जिस चांद में विज्ञान को ग्रह-उपग्रह के अलावा कुछ विशेष दिखाई नहीं दिया, उसी चांद में प्रेमियों ने सब कुछ पा लिया-


कल चौदवीं की रात थी,


शब भर रहा चर्चा तेरा


कुछ ने कहा यह चांद है,


मैंने कहा चेहरा तेरा।


उस चांद से मिलन के लिए रातें भी कुबूल हैं। अर्थात् जीवन में कितना भी कष्ट हो, संघर्ष हो, असफलता हो,निराशा हो फिर भी प्रेमी को सुख और सुकून अपने प्रेम के पास ही मिलता है-


ये अंधेरे मुझे इसलिए है पसंद,


इनमें छाया भी अपना दिखाई न दे


रोशनी हो वहां तू जहां भी रहे ,


हर खुशी हो वहां तू जहां भी रहे।


महर्षि नारद ने हिमालय पुत्री को कहा कि तुम विष्णु से विवाह कर लो। पार्वती ने कहा कि मेरा प्रेम शंकर के प्रति है। नारायण भक्त नारद ने कहा कि विष्णु के पास सब कुछ है, शंकर के पास क्या है? पार्वती ने बहुत प्यारा सा जवाब दिया उनके पास मेरा ह्रदय है।


नारद आश्चर्यविमुग्ध-भाव से पार्वती की ओर देखते रह गए।


जब पार्वती ने पूछा कि मुझे अपने प्रेमी को प्राप्त करने का उपाय बताएं।


तब महर्षि नारद का उत्तर भी बहुत आश्चर्य में डालने वाला है और भारतीय संस्कृति की ऊंचाइयों को बताने वाला है-


"तप आधार सब सृष्टि भवानी ,


करहूं तप अस जिय जग जानी।"


इस भोगवादी दुनिया में करवा चौथ जैसा पर्व प्रेम को तन के धरातल से ऊपर उठाते हुए मन को ऐसा तैयार करता है कि प्रेम आत्मिक हो जाता है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे


करवा चौथ की शुभकामनाएं🙏🌹