खेल को खेल ही रहने दो
October 28, 2021संवाद
"खेल को खेल ही रहने दो"
क्रिकेट के व्यवसायीकरण और राजनीतिकरण ने इस खेल को खेल नहीं रहने दिया है। भारत पाक क्रिकेट मैच खेल से ज्यादा सियासती-खेल के रूप में तब्दील हो जाता है।
जिस खेल का आयोजन दिलों को जोड़ने के लिए और सीमाएं मिटाने के लिए किया जाता है; वही खेल कुछ और कर जाता है।
बहुत पहले से भारी प्रचार और उसकी दिन-रात चर्चाएं कर एक ऐसा माहौल बना दिया जाता है, जो खेल की मूल भावना को नष्ट कर उसे उन्माद में बदल देता है।
मुझे क्रिकेट खेल तथा खिलाड़ियों को बहुत नजदीक से जानने का सौभाग्य मिला। खेल ने मुझे यही सिखाया कि पल भर में सब कुछ बदल जाता है। जहां जीत का पूरा भरोसा था,वहां गले में हार लटकी मिलती है और जहां हार सुनिश्चित थी, वहां जीत का सूर्य अचानक चमक उठता है। लेकिन हार हो या जीत दोनों ही स्थितियों से ऊपर उठकर खेल का अपना एक अलग आनंद होता है। अतः खिलाड़ी को फूल मिले या शूल बहुत ज्यादा अंतर नहीं पड़ता क्योंकि उसकी खेल-भावना वाली मानसिकता दोनों ही स्थितियों के लिए तैयार रहती है-
"मधु का स्वाद लिया है तो,
विष का भी स्वाद बताना होगा।
खेला है फूलों से वह ,
शूलों को भी अपनाना होगा।।"
तभी तो असली खिलाड़ी(विराट कोहली) अपने को हराने वाले (रिजवान)से भी बधाई देने हेतु गले मिल जाता है और जीतने वाला(रिजवान) हारने वाले (विराट)को अपना आदर्श बताता है। फर्श से अर्श और अर्श से फर्श तक की यात्रा में संतुलन साधने के लिए खेल तैयार कर देता है।
टीवी चैनलों में कई दिनों से इसे कोई विराट-विश्वयुद्ध बता रहा था तो कोई महामुकाबला ; कोई कयामत की रात बता रहा था तो कोई बदले का दिन । लेकिन मैं जानता था कि मैच के दिन कुछ भी हो सकता है क्योंकि 'मनुज बली नहीं होत है,समय होत बलवान।'
खिलाड़ियों ने खेल का आनंद उठाया किंतु सियासतदानों ने अपनी-अपनी व्याख्याओं से राजनीति का खेल शुरू कर दिया। उन व्याख्याओं के कारण खेल भी धर्म और देश से जुड़ गया और दिलों की खाइयों को और बढ़ा गया।
खिलाड़ियों के बीच दिख रहा सद्भाव राजनीतिक-जुबान के कारण दर्शकों के बीच दुर्भाव के रूप में तब्दील हो गया क्योंकि खेल-भावना की जगह राजनीतिक-भावना ने अपना कमाल दिखाना शुरू कर दिया।
भारतीय दर्शन कहता है कि परमात्मा ने यह सृष्टि खेल-खेल में बनाई, जिसमें हार-जीत, दिन-रात करवट बदलने के समान है। अतः खेल प्रेम का पैगाम बन जाता है क्योंकि खेलने वाले ही नहीं,देखने वाले भी आनंद से भर जाते हैं। आनंदित व्यक्ति के कारण जीवन स्वर्ग बन जाता है।
दूसरी तरफ राजनीति है जो बांटकर और दिलों में नफरत के बीज बो कर संसार को नर्क बना देती है।
जिन्हें जहन्नुम पसंद हो वे राजनीतिक-भावना का चुनाव कर लें और जिन्हें जन्नत पसंद हो वे खेल-भावना का।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹