संवाद


"डकैतों का हृदय-परिवर्तन करने वाले 'भाई जी' नहीं रहे"


'चंबल के गांधी' के नाम से मशहूर डॉ सुब्बाराव जी पंचतत्व में विलीन हो गए। ९२ वर्ष की अवस्था में पार्थिव शरीर छोड़ने के पहले उन्होंने सादगी-सेवा-समर्पण की ऐसी विरासत छोड़ी है, जिसे संभाल कर रखा जाए तो यह संसार सद्भावना-सच्चरित्र-शांति की ऊर्जा से ओतप्रोत हो सकता है।


ऐसे सद्गुणों की बात किताबों में खूब पढ़ाई जा रही है किंतु जीवन में बामुश्किल कहीं-कहीं दिखाई दे रही है। आखिर क्या कारण है कि पढ़े-लिखे लोगों की दुनिया में आज परीक्षा कराना इतना मुश्किल हो गया है कि सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। सरकारों की सारी कोशिशों के बावजूद भ्रष्टाचार और व्यभिचार रुकने का नाम क्यों नहीं ले रहा है?


ऐसे प्रश्नों का उत्तर मुझे "भाई जी" के नाम से मशहूर सुब्बारावजी के जीवन को जानने के बाद मिला। महात्मा गांधी के सान्निध्य में रहकर और उनके बताए मार्ग पर चलकर उन्होंने अपना जीवन सत्य-प्रेम-अहिंसा से ऐसा आपूरित किया कि उनके प्रभाव-क्षेत्र में आने से चंबल के डकैतों का हृदय-परिवर्तन हो गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण की उपस्थिति में आत्मसमर्पण करके उन डकैतों ने सुब्बाराव जी के प्रयासों के कारण सादगी और सेवा के गांधीवादी मार्ग पर अपना नया जीवन शुरु किया।


दक्षिण भारत के बेंगलुरु शहर से आकर उन्होंने मध्य-प्रदेश और राजस्थान के ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में लाखों युवाओं को "एक घंटा देह के लिए और एक घंटा देश के लिए" अभियान से जोड़ा। उनकी प्रेरणा से स्वस्थ और देशभक्त पीढ़ी तैयार हुई। सेवा भावी मुख्यमंत्री गहलोत जी का जीवन इन्हीं के सान्निध्य में निर्मित हुआ।


मनुष्य जैसा जीवन देखता है और जैसे व्यक्तियों का चिंतन करता है, उसका जीवन वैसा ही हो जाता है। आज टीवी चैनलों पर दिन-रात विवादास्पद व्यक्तियों को दिखाया जा रहा है और उन्हीं पर चर्चा कराई जा रही है।


इस "जिंदा गांधी" के निधन की खबर समाचारपत्र में पढ़कर मैंने कई tv चैनलों पर देखने का प्रयास किया कि इतने महान व्यक्तित्व पर सार्थक और प्रेरक चर्चा सुनने को मिले; किंतु निराशा हाथ लगी। सारे चैनल खेल,चुनाव और ड्रग्स के बारे में दिखा रहे हैं और हमारी युवा पीढ़ी इन्हें ही देख रही है।


ऐसे में सादगी-सेवा- समर्पण का भाव जीवन में लाने के लिए नौजवानों को ही डा.सुब्बाराव जी के बारे में ढूंढकर पढ़ना होगा और शिक्षा जगत को इसके लिए उन्हें प्रेरित करना होगा। राष्ट्रकवि दिनकर के शब्दों में-


"महलों में गरुड़ न होता है,


कंचन पर कभी न सोता है।


बसता वह कहीं पहाड़ों में,


शैलों की फटी दरारों में।।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे


विनम्र हार्दिक श्रद्धांजलि🙏🌹