प्रश्न राष्ट्रीय-एकता का भाव जगाने वाली शिक्षा और नेतृत्व का
October 31, 2021संवाद
"प्रश्न राष्ट्रीय-एकता का भाव जगाने वाली शिक्षा और नेतृत्व का"
आयरनमैन का जन्मदिवस हो या Iron-lady का बलिदान-दिवस एकता की परिस्थिति और मन:स्थिति के संबंध में विचार-विमर्श का महत्वपूर्ण दिवस है।
स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की ऊंचाई जितनी ज्यादा है, हमारा एकता का भाव उतना ज्यादा गहरा नहीं है। तभी तो एक तरफ भारत को हराकर पाकिस्तान के जीतने पर अपने देश में पटाखे फोड़ कर जश्न मनाने की तस्वीरें आती हैं और दूसरी तरफ देशभक्ति का प्रमाण मांग कर किसी को प्रताड़ित करने की खबरें सुर्खियां बनती हैं।
अनेक रियासतों और अनेक खंडों में बंटे हुए भारत को सरदार ने अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति और विलक्षण प्रतिभा से राजनीतिक-एकता प्रदान की। स्वतंत्रता के बाद इस राजनीतिक एकता को वैचारिक-एकता तथा भावनात्मक-एकता में तब्दील करने का काम शिक्षा और शिक्षकों को करना था।
एक उदार-सर्वसमावेशी-समान शिक्षा पर राष्ट्र को सबसे ज्यादा ध्यान देना था। लेकिन बजट निर्धारण से लेकर प्राथमिकता के दृष्टिकोण तक से शिक्षा-विभाग सबसे उपेक्षित विभाग रहा। इसके ऊपर "शिक्षा का राजनीतिकरण" होने से शिक्षा पर राजनीतिक शिकंजा लगातार कसता गया। आज स्थिति यह हो गई है कि किस महापुरुष को सिलेबस में रखा जाए या शिक्षा का स्वरुप क्या हो;यह पार्टी-लाइन से तय हो रहा है।
व्यक्ति,परिवार,समाज, राष्ट्र और पार्टी सबका अपना-अपना महत्त्व है। लेकिन प्राथमिकता के निर्धारण में भारतीय संस्कृति और शिक्षा ने इन सबके ऊपर आत्मा को महत्त्व दिया है-
"त्यजेदेकं कुलस्यार्थे, ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्
ग्रामम् जनपदस्यार्थे,आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्।"
अर्थात स्वयं को परिवार के लिए न्योच्छावर कर दो, परिवार को गांव की सेवा में लगा दो, गांव को राष्ट्र के लिए कुर्बान कर दो। इसी भावना के कारण भारत माता के सपूतों ने हंसते-हंसते अपना सब कुछ देश के लिए न्योछावर कर दिया।
किंतु हमारे ऋषि कहते हैं कि आत्मा के लिए पूरे पृथ्वी को छोड़ने की तैयारी रखो। गौतम ने अपना राज्य और राजमहल छोड़ दिया ताकि आत्मा उपलब्ध हो। तभी वे बुद्ध बने।
यहां आत्मा का अर्थ है सर्वजनहिताय और सर्वजनसुखाय सत्य की उद्घोषणा का साहस।
यही कारण था कि लौहपुरुष ने राष्ट्रनिर्माण के लिए किसी भी धार्मिक कट्टरता को बर्दाश्त नहीं किया।
महात्मा और सरदार ने कई अवसरों पर ऐसी बात कही जो पार्टी लाईन के विरूद्ध जाती थी किंतु राष्ट्रहित में थी। कभी-कभी तो राष्ट्रहित के ऊपर जाकर इन महापुरुषों ने अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर मानवता-हित की बात की।
आज सबसे बड़ी चिंता और चिंतन का विषय यह है कि आत्मा को जगाने वाली शिक्षा कहां से लाई जाए, और हम गांधी और पटेल जैसा नेतृत्व कहां से लाएं जो सबका प्रतिनिधित्व करे। आज किसी जाति,धर्म,क्षेत्र,दल का नेता तो मिलता है; किंतु भारत का नहीं मिलता।
भारत जैसे विशाल और विविधता से पूर्ण देश का नेता बनने के लिए हृदय विशाल होना चाहिए और शिक्षा 'सर्वे भवंतु सुखिन:' की भावना जगाने वाली होनी चाहिए। तभी राष्ट्रीय एकता अक्षुण्ण बनी रह सकती है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे
राष्ट्रीय एकता दिवस की शुभकामना🙏🌹