संवाद


"अंतरदीप जले तो... दीपावली"


दीप जले तो सोए हुए को भी जगना पड़ता है और जागरण बहुत बड़ी परेशानी का सबब बनती है।


क्योंकि अंधेरे की अपनी सुविधा है;न घर के जाले दिखाई देते हैं, न लटकी मकड़ियां और न कोई गंदगी। फिर साफ-सफाई करने की परेशानी से भी व्यक्ति बच जाता है।


किंतु प्रकाश होते ही चारों तरफ समस्याएं ही समस्याएं दिखाई देने लगती हैं। खासकर जिनका अंतरदीप भी जल गया हो,उनकी परेशानियों की तो कोई सीमा नहीं-


"दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोए,


सुखिया सब संसार है, खायै अरु सोए‌।"


परंपरा में तो करुणामूर्ति-मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आने पर दीपावली मनाई गई थी किंतु हम तो व्यभिचार और भ्रष्टाचार रूपी रावण के बढ़ते जाने पर भी घर के बाहर दीप जलाकर दीपावली मना लेते हैं।


अंतरदीप की तो कोई बात ही नहीं करता।


सुना है शिक्षा चेतना के अंतरदीप जला देती है। किंतु शिक्षा की जैसी दुर्दशा चारों तरफ दिखाई दे रही है, उस दुर्दशा से आंख मिलाने का साहस नहीं हो रहा है।शिक्षालयों में शिक्षक नहीं है, जो कम शिक्षक हैं उनको भी पढ़ाने की सुविधा नहीं। फिर भी विद्यार्थी पढ़ ही नहीं रहे हैं बल्कि परीक्षा देकर अच्छे अंकों से पास भी हो रहे हैं और डिग्रियों का अंबार भी खड़ा कर रहे हैं।


शिक्षा के नाम पर हो रहे धोखे से अनजान युवा पीढ़ी इंटरनेट से कामुक और हिंसक दृश्यों द्वारा अपना मनोरंजन कर रही हैं। और धीरे-धीरे ड्रग्स और अपराध की गिरफ्त ‌में फंसती जा रही हैं।


Cop26 सम्मेलन में एक तरफ कार्बन-उत्सर्जन की मात्रा कम करने हेतु विश्वव्यापी चिंतन चल रहा है दूसरी तरफ महामारी के काल में ऑक्सीजन की कमी से लाखों परिजनों को खोने वाले लोगों का यह तथाकथित शिक्षित देश अरबों रुपए के पटाखे जलाकर दीपावली के नाम पर प्रदूषण फैला रहा है।


बाहर जितनी चकाचौंध रोशनी बढ़ती जा रही है,अंदर उतना ही अंधकार घना होता जा रहा है।


क्या इसे ही दीपावली कहते है?


भारतीय संस्कृति तो अंतर में राम के आने पर बाहर में दीप जलाकर दीपावली मनाती है, पटाखा फोड़कर प्रदूषण फैलाकर नहीं-


"क्यों कर भूले भटके फिरते,


भेद ढूंढने जग नश्वर का।


अंतरदीप जला कर देखो,


मानव ही प्रमाण ईश्वर का।।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे


दीपावली की शुभकामना🙏🌹