संवाद


"पटाखों वाली दिवाली का औचित्य?"


नूतन-वर्ष नई वैज्ञानिक चेतना की राह देख रहा है, जो परंपरा के नाम पर चल रहे सड़े-गले रीति-रिवाजों को छोड़ने का साहस दिखा सके। दीप जलाने वाली संस्कृति में परंपरा के नाम पर कब पटाखों का प्रवेश हो गया और कब बाजार की शक्तियों द्वारा उन्हें प्रमुखतम बना दिया गया, इस पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है।


'देख के दुनिया की दिवाली, दिल मेरा चुपचाप जला.. ' पटाखों की आवाज प्रतिपल लगातार सुनाई दे रही हैं। लोगों के जोश के साथ होश नहीं दिखता। महामारी ने कई त्योहारों पर खुशी मनाने का मौका हमारे हाथों से छीन लिया था। लगता है छूटे हुए अवसरों की कोर कसर इस दिवाली में निकालने की लोगों ने ठान रखी हैं।


लेकिन महामारी-विशेषज्ञऔर स्वास्थ्य-विशेषज्ञ बहुत चिंतित हैं। उनके अनुसार यह धरती अब थोड़ी सी भी लापरवाही बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है। हवाएं पहले ही इतनी प्रदूषित हो चुकी हैं कि जिनमें श्वास लेना एक साथ कई सिगरेट पीने के समान हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआं ही इतना खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है कि ऑड-इवन जैसे अनेक फॉर्मूले भी कारगर नहीं हैं।


सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश के बावजूद पटाखों के प्रति हमारा जुनून कम नहीं हुआ । हमने चेतना के दीप तो जलाए नहीं,इसके विपरीत मूढ़ता की मशालें हाथों में उठा ली हैं।


दूसरी लहर में ऑक्सीजन के अभाव में तड़प-तड़प कर सड़कों पर मरते लोगों का दृश्य और एक साथ अनगिनत जलती चिताओं पर करुण-क्रंदन पुकार का शोर हमारी आंखों और कानों से इतनी जल्दी ओझल हो जाएगा, हमने कभी सोचा न था। मास्क के बिना बाजारों में भारी भीड़ और आतिशबाजी के कारण आकाश में उठते धुएं के बादल देखकर लगता है कि हमने तीसरी लहर के स्वागत की तैयारी कर ली है।


संस्कार और आदतें आदमी को कितना मजबूर कर देती हैं कि दिल्ली में पटाखों के कारण एयर क्वालिटी इंडेक्स इतने खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है कि जिसमें श्वास भी नहीं लिया जा सकता।


हमारे बच्चों को 10 साल पहले शिक्षक ने प्रदूषण का कोई पाठ पढ़ाया था और आज तक बच्चे पटाखे को हाथ तक नहीं लगाते। उत्साह में कभी फुलझड़ी वगैरह भी लाकर दिया तो उन्होंने उसे भी जलाने से मना कर दिया, यह कह कर कि धुआं तो इससे भी होता है।


पटाखों का शौक पूरा करके जितने लोगों ने वातावरण को चारों तरफ से प्रदूषित कर दिया है, उतने लोग यदि पेड़ लगाने का शौक पाल लेते तो गली-गली एक हरा वृक्ष सारे कार्बनडाइऑक्साइड को सोखकर हमें ऑक्सीजन से भरपूर कर देता।


किंतु हमें हमारी मूढ़ता को बताकर जिंदगी जीने का तौर-तरीका सिखाने वाले जिंदा शिक्षक कितने हैं जो संस्कृति के नाम पर पनप रही विकृति को रोक कर प्रकृति को सुंदर बनाने में समर्थ हैं।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे


नूतन वर्ष की शुभकामना🙏🌹