'संवाद'


"छठ-पर्व: पर्यावरण शुद्धिकरण का महायज्ञ"


प्रकृति-पूजक भारत देश के पूर्वांचल में मनाया जाने वाला छठ पर्व एक ऐसा अनूठा पर्व है, जो पर्यावरण- संरक्षण के लिए एक मानक स्थापित करता है। जलाशयों के किनारे डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य चढ़ाने वाला यह पर्व जलाशयों की सफाई कर सुंदर घाट बनाने से लेकर जलाशयों तक जाने वाले रास्तों की सफाई तक पर पूरा ध्यान देता है। इसमें बाह्य-पर्यावरण की शुद्धि के साथ अंतर्मन की शुद्धि हेतु व्यक्तिगत आस्था को जन-आंदोलन का रूप दे दिया जाता है।


यदि ऐसे पर्व से अधिकाधिक लोगों को जोड़ा जा सके तो जल-प्रदूषण और वायु-प्रदूषण के साथ मानसिक-प्रदूषण को भी नियंत्रित किया जा सकता है। इस पर्व की वैज्ञानिकता और दार्शनिकता अद्भुत है‌।


वैज्ञानिकता -पूजा के समय चढ़ाया गया अर्घ्य-जल सूर्य की किरणों के संस्पर्श से कुष्ठ-रोग के निवारण में समर्थ है। यदि जलाशय साफ सुथरा रहे तो स्वच्छ आकाश से आने वाली सूर्य की किरणें अर्घ्य- जल से गुजरकर जब शरीर को स्पर्श करती हैं तो किसी भी प्रकार का चर्म-रोग सही हो जाता है।


दार्शनिकता :-छठ पर्व की शुभ-वेला में डूबते सूरज के आगे जिस भावपूर्ण और शांत मुद्रा के साथ घर की औरतों को दिनभर उपवास के बाद अर्घ्य चढ़ाते हुए देखता था तो एक प्रश्न मन में बचपन से ही हमेशा उठा करता था- *"दुनिया तो सिर्फ उगते सूरज की पूजा करती हैं; फिर छठ में लोग डूबते सूरज की पूजा से प्रारंभ क्यों करते हैं?"


खोजबीन की तो पता चला कि अंगदेश के राजा कर्ण नित्य प्रति डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य-जल चढ़ा करके याचकों को मुंहमांगा दान दिया करते थे। वहीं से परंपरा में यह बात आ गई‌। दरअसल उतार-चढ़ाव जीवन का हिस्सा है, अतः डूबते सूर्य के प्रति सबसे पहले श्रद्धा भाव रखो। इसी श्रद्धा से तुम्हारे भाग्य का सूर्य भी उदित होगा-


"डूबे हैं हम जहां पर,


उभरेंगे फिर वहीं से‌।


यह राज सुन रहे हैं,


एक मौजे-तहनशीं से।।"


आंतरिक-भाव की शुद्धता के प्रति पूरे समाज की आस्था इस पर्व विशेष के अवसर पर अवर्णनीय होती है। छठ पर्व के दौरान छेड़खानी जैसी घटनाएं भी अपवाद रूप में ही सुनने को मिलती हैं।


इससे भी बढ़कर पूजा के बाद जो परसादी में स्वाद होता है,वो कहां से आता है , पता नहीं चलता। लगता है अंतर्मन की शुद्धि लौकिक-अन्न को अलौकिक-स्वाद दे जाती है।


पूर्वांचल क्षेत्र के लोग जो दूसरे राज्यों या दूसरे देशों में बस गए हैं, वे बड़ी आस्था के साथ छठ पर्व वहां मनाते हैं। इस महापर्व का यही महत्व है कि जलवायु-परिवर्तन और पर्यावरण-प्रदूषण के संबंध में विश्व की सरकारें भी कुछ विशेष नहीं कर पा रही हैं, वहां एक स्थानीय-पर्व भी लोगों की आस्था के बल पर बहुत बड़ा काम कर सकता है।


आज जब दिल्ली में वायु-प्रदूषण के कारण धुंध से सूर्यदेव छुप गए हैं और जल-प्रदूषण के कारण यमुना में अमोनिया का स्तर बढ़ गया है;तब छठ जैसे पर्व के प्रति लोगों की श्रद्धा से पर्यावरण-शुद्धि का महायज्ञ सफल बनाया जा सकता है‌।


बस जरूरत है छठ पर्व के प्रति जो भाव कुछ लोगों का है, उस भाव की वैज्ञानिकता और दार्शनिकता को उभारकर सामान्य जन को सामान्य दिनों के लिए भी स्वच्छता और शुद्धि के मूलमंत्र से जोड़ा जा सके।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे


छठ पर्व की शुभकामना🙏🌹