संवाद


"सीखने की प्रवृत्ति और शक्ति"


गृहस्थ रहते हुए संन्यासी का जीवन जीने वाले गुरु नानक जी ने सिक्ख-धर्म की स्थापना की।


आज धर्म के नाम पर हो रहे विवादों के कारण जो धर्म समाधान देने में समर्थ हैं, वे ही समस्या बन गए हैं। धर्मों की विविधता वाला देश भारत यदि अपने इस शक्ति को पहचानने में समर्थ हुआ तो एक ऐसी पीढ़ी तैयार होगी जो हर धर्म से बहुत कुछ सीख सकती हैं। इसी सीखने की प्रवृत्ति पर सबसे ज्यादा जोर देने के कारण सिक्ख-धर्म मुझे बहुत प्रिय है।


वस्तुत: "सिक्ख" शब्द संस्कृत के 'शिष्य ' शब्द से बना है। 'शिष्य गुरु संवाद'भारतीय संस्कृति की सबसे अनूठी देन है। 'अथातो धर्म जिज्ञासा' ,'अथातो भक्ति जिज्ञासा', 'अथातो ब्रह्म जिज्ञासा'इन वाक्यों से हमारे महत्वपूर्ण शास्त्र प्रारंभ होते हैं। जिज्ञासा का अर्थ है जानने की इच्छा। यह इच्छा जब बलवती हो जाती है तो शिष्य का जन्म हो जाता है। जानने की बेचैनी उसे दिन-रात जगाए रहती है और गुरु की खोज में ले जाती है।


शिष्य के दो महत्वपूर्ण गुण होते हैं -(1) 'शासनात् इति शिष्यम्' अर्थात् जो शासन करने योग्य हो। यानी जो अपने आप को गुरु के अनुसार ढालने को सदैव तैयार रहे।( 2)'शंसनात् इति शिष्यम्' अर्थात् जो अपना विश्लेषण करते रहे, अपने गुण-दोषों को परखते रहे।


सीखने की उत्कट अभिलाषा और समय के अनुसार अपने आप को ढाल लेने की प्रवृत्ति के कारण गुरु नानक की आध्यात्मिक शक्ति और उपदेश से शुरू हुआ धर्म अपनी शारीरिक शक्ति को भी चरम पर पहुंचाया। कलम के साथ तलवार भी उठाया।


अपने गुरु ग्रंथ में सिख गुरुओं के साथ 30 अन्य हिंदू और मुस्लिम संतों की वाणियों को भी स्थान दिया। जिस धर्म और जिस जाति में दिव्य-आत्माएं मिलीं, उनको अपने आदि-ग्रंथ में स्थान देने वाले सिक्ख धर्म से आज बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।


गुरु नानक द्वारा शुरू की गई लंगर- प्रथा ने तो महामारी के काल में सभी भेदभाव से ऊपर उठकर जो मानवता की सेवा की है, उससे पेट की भी भूख मिटी है और लोगों की आत्मा की भी भूख .-


"जबीं झुकाओ,अदब का मुकाम आया है


जुबां पर आज नानक का नाम आया है।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे


गुरु-नानक जयंती की शुभकामना🙏🌹