संवाद


"मदिरा:विरासत या सियासत?"


26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है। संविधान का अनुच्छेद 47 कहता है कि राज्य नशीले पेय को प्रतिबंधित करने का प्रयास करेगा। क्या राज्य संविधान में दिए गए नीति निर्देशक तत्वों की पालना हेतु प्रतिबद्ध दिखते हैं?


गांधी जी का कथन है कि शराब शरीर ही नहीं,आत्मा को भी खराब कर देती है। किंतु बापू का देश मदिरा के प्रति नीति और नीयत के मामले में एक नहीं है।


मध्य प्रदेश सरकार महुआ से बनने वाली शराब को विरासत मदिरा के रूप में मशहूर बनाने के लिए नई आबकारी नीति बनाने जा रही है तो बिहार शराब के पूर्ण प्रतिबंध के पक्ष में है।


पूर्ण-शराबबंदी वाले बिहार में जहरीली शराब पीने से 50 लोग मर गए। लगभग सभी पार्टियों ने नीतीश सरकार से मांग की कि इस कानून पर पुनर्विचार किया जाए। गहन समीक्षा बैठक के बाद नीतीश कुमार ने घोषणा की कि-


"न किसी को पीने देंगे और


न राज्य में शराब आने देंगे।"


लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि शराब खूब पी जा रही है और बाहर से राज्य में शराब आ भी रही है। चोरी-छिपे शराब बनाई भी जा रही है और यदि शराब नहीं मिल रही है तो वहां गांजा,चरस,स्मैक की सप्लाई बढ़ गई है।


इससे एक महत्वपूर्ण प्रश्न उपस्थित हुआ है कि "यदि लोग नशे के बिना नहीं रह सकते तो क्या शराबबंदी कानून हटा दिया जाना चाहिए?"


एक तरफ शराबबंदी कानून के समर्थक कहते हैं कि इससे कई प्रकार के अपराधों में भारी कमी आई है तो दूसरी तरफ विरोधी कहते हैं कि राजस्व का भारी घाटा हो रहा है और इसका लाभ पड़ोसी राज्यों को मिल रहा है,जहां शराबबंदी नहीं है।


नशे के विरुद्ध जनजागरूकता का बड़ा अभियान लगभग सभी महापुरुषों ने चलाया। स्वतंत्रता जैसे बड़े उद्देश्यों के लिए लोगों को तैयार करने में उन्हें अद्भुत सफलता मिली और नशे की गुलामी से मुक्ति में भी बहुत बड़ी कामयाबी मिली। उस समय राजनीतिक दलों का पहला काम समाज-सुधार का होता था। इसमें शिक्षा और समाज की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती थी। सादा जीवन,उच्च विचार वाले लोग गांव-गांव एक वातावरण का निर्माण कर देते थे, जिसमें नशा अपने आप छूट जाता था या नशे का कारोबार बहुत कम हो जाता था।


आज विकास का एक महत्वपूर्ण मापदंड अर्थव्यवस्था ही रह गया है। अतः दिल्ली जैसे राज्यों में शराब की दुकानें निजी क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा खोलने की नीति बनाई जा रही है। दूसरी तरफ शराबबंदी को पूर्णरूपेण लागू करने के लिए कई राज्यों में महिलाओं का विरोध-प्रदर्शन बढ़ता जा रहा है।


किंतु नशे की लत इंसान को इतना मजबूर कर देती है कि-


"अच्छी या खराब पी ली


जो भी मिली शराब पी ली।"


जब तक जनजागरण अभियान द्वारा व्यक्ति को बड़े उद्देश्य से नहीं जोड़ा जाता और समाज- सुधार का बहुत बड़ा अभियान प्रमाणिक व्यक्तियों द्वारा नहीं शुरू किया जाता तब तक मद्यनिषेध या नशा मुक्ति अभियान को सफल नहीं बनाया जा सकता।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे


संविधान-दिवस की शुभकामना🙏🌹