संवाद


"जन्मदिवस महत्वपूर्ण जीवन गौण"


बर्थडे की बधाई हर एक को सुखद मालूम पड़ती है किंतु मैं तो चौंक गया क्योंकि मैं तो उस जमाने में पैदा हुआ था जब न तो जन्म-दिवस मनाया जाता था और न केक काटे जाते थे। आज के जमाने में पुराना मन शिष्टाचार के नाते बधाई को अस्वीकार भी नहीं कर सकता और अजीबोगरीब मिश्रित भाव दशा में बधाई को पूरा स्वीकार भी नहीं कर सकता। आखिर क्यूं?


अकस्मात् मेरे व्हाट्सएप पर एक मैसेज दिखा- "जन्म-दिवस की बधाई हो,भाई साहब! मैंने सोचा- शायद गलती से यह मैसेज हमारे आदरणीयजन ने मुझको प्रेषित कर दिया है क्योंकि आज तक कभी किसी ने मुझे जन्मदिवस की बधाई नहीं दी थी।


कभी किसी का जन्म-दिवस मनाने का रिवाज मेरे बचपन के समय में मेरे घर में नहीं था। बाबूजी की मिलिट्री की नौकरी से घर किसी तरह चल जाता था और पढ़ने-लिखने जैसी अनिवार्य आवश्यकताएं ही पूरी हो पाती थीं।


उस समय के संयुक्त परिवार में घर में किसी का भी निश्चित जन्मदिन पता नहीं रहता था। स्कूल जाने पर शिक्षक जो जन्मदिन लिख देता था,वही प्रमाणिक हो जाता था। इतना भर पता होता था कि इस वर्ष में इस घर में तीन बच्चे कुछ अंतराल पर पैदा हुए थे।


अतः सुबह में आए जन्मदिवस की बधाई वाले मैसेज पर मैंने ध्यान नहीं दिया किंतु शाम को मेरे दो प्रिय शिष्य उपहार लेकर पहुंच गए। मैंने सकुचाते हुए उनसे कहा कि आपके प्रेम को मैं अस्वीकार नहीं कर सकता किंतु जन्मदिवस की बधाई को भी स्वीकार करने की मन:स्थिति में नहीं हूं।


जब मुझे ही पता नहीं तो आप बताएं कि आपको कैसे पता चला कि मेरा जन्मदिवस आज है। उन्होंने कहा- फेसबुक से


उनके जाने के बाद अपने अंदर के मनोभावों से मैं बहुत देर तक संघर्ष करता रहा। यद्यपि आज की पीढ़ी का जन्मदिवस अत्यंत सादे रुप से घर में मैं भी मना लेता हूं किंतु पुरानी पीढ़ी के मेरे शिक्षक कहा करते थे कि-"जन्म होना महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है जीवन पा लेना।


जीवन मिलता है गुरु कृपा से। अतः शिक्षा के बाद ही व्यक्ति हमारी संस्कृति में द्विज कहलाता है। द्विज होने के बाद भी जिनका जीवन जगतकल्याण और जनकल्याण के लिए बहुत बड़ा त्याग करने में समर्थ होता था, ऐसे लोगों के जीवन की सार्थकता को देखते हुए लोग उनके जन्मदिवस को उनके जाने के बाद मनाना शुरू कर देते थे। उनका कर्म इतना महान होता था कि वे अपने पीछे अपनी पहचान और अपने महान निशान छोड़ जाते थे-


"आए हो तो दुनिया में


कुछ ऐसे निशां छोड़ो,


हर आंख में आंसू हो,


जब तुम ये जहां छोड़ो।"


गांधी,सुभाष,भगत सिंह जैसे महापुरुषों के जीवन काल में जन्म दिवस मनाने का वृतांत आज तक मेरे को पढ़ने को नहीं मिला। जब वे अपने जीवन को राष्ट्र की बलिवेदी पर कुर्बान कर दिए, तब उनका जन्मदिवस अन्य लोगों द्वारा मनाया जाने लगा।


आज की पीढ़ी की सोच बदल गई है। स्वयं ही अपने जन्मदिवस पर बड़ी पार्टियों का आयोजन करने लगे हैं और लोगों की इतनी बधाइयां मिलती हैं कि लगता है कि जन्म लेकर कुछ बड़ा काम किया है और धरा पर विशेष उपकार किया है। इस कृत्रिम चकाचौंध में जन्म महत्वपूर्ण हो जाता है , जीवन गौण रह जाता है।


एक ऐसे वातावरण का निर्माण हुआ है कि जिसमें एक निर्धन परिवार के बच्चे को अपना जन्मदिवस खुशी देने के बजाय हीनभावनाओं से भर जाता है।


बाजार की संस्कृति ने बर्थडे ,मैरिज डे इत्यादि का प्रचलन बढ़ा कर पार्टियां आयोजित कर खाने और खिलाने तक की सोच में हमें कैद कर लिया है। जन्मदिवस के विरोध में मैं नहीं हूं किंतु "परमारथ के कारने साधुन् धरा शरीर"वाली संस्कृति यह सोचने पर विवश करती हैं कि सिर्फ होना महत्वपूर्ण नहीं है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है सार्थक होना -


"न था कुछ तो खुदा था ,


कुछ न होता तो खुदा होता।


डुबोया मुझको होने ने,


न होता मैं तो क्या होता।।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹