खेलों को भी संबल मिले
December 3, 2021संवाद
"खेलों को भी संबल मिले"
'विद्या संबल योजना ' के द्वारा राजस्थान सरकार ने कॉलेजों में कई विषयों में शिक्षकों के खाली पड़े पदों को भरकर क्लास-टीचिंग को नियमित करने का बहुत ही सराहनीय कदम उठाया। इससे वीरान पड़े कॉलेज गुलजार हो गए और कई बेरोजगारों को रोजगार भी प्राप्त हो गए। क्योंकि इनकी नियुक्ति सिर्फ पढ़ाने के कार्य के लिए हुई है और इनसे अन्य कोई भी दूसरा कार्य नहीं लिया जा सकता; अतः विद्यार्थी भी भारी संख्या में कक्षाओं में आने लगे और क्लासेज भी नियमित होने लगी।
अस्थाई शिक्षकों के सहारे पढ़ने-पढ़ाने के माहौल को स्थाई रूप देने में विद्या संबल योजना प्रभावी साबित हो रही है। किंतु स्थाई शिक्षकों पर शैक्षिकेत्तर कार्यभार बहुत ज्यादा बढ़ गया। बहुत सारी समितियों और सूचनाओं के कार्यों से प्रोफेसर्स का क्लास-टीचिंग ही नहीं रिसर्च -वर्क भी प्रभावित हो रहा है।
इधर खेल-प्रतियोगिताओं के शुरू होने से पहले से कम संख्या में उपलब्ध प्रोफेसर्स पीटीआई की भूमिका में नजर आने लगे हैंऔर उनकी क्लासेज प्रभावित हो रही हैं।
बहुत सारे विद्यार्थियों में खेल की नैसर्गिक प्रतिभा भी होती हैं और उनका रुझान भी देखने को मिलता है किंतु स्पोर्ट्स टीचर के अभाव में और नियमित अभ्यास के लिए जरूरी संसाधनों के बिना सिर्फ खेल-प्रतियोगिताओं से खेल की प्रतिभा नहीं निखर सकती।
ओलंपिक में महिला हॉकी टीम ने जब अपने प्रदर्शन से सबको चौंका दिया तब यह सत्य ध्यान में आया कि खेलों में अपनी रूचि के कारण इच्छाशक्ति के बलबूते पर गरीबी आदि सारी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी विश्व स्तर की प्रतिभाएं निकल सकती हैं। यदि ऐसी प्रतिभाओं को प्रारंभिक स्तर से कोच और नियमित अभ्यास के संसाधनों को उपलब्ध कराए जाए तो भारत विश्व विजेता भी बन सकता है।
शिक्षा जगत सभी प्रकार की प्रतिभाओं को निखारने हेतु मंच देता है। शैक्षिक-गतिविधियां तो प्रमुख होती ही हैं किंतु सह-शैक्षिक गतिविधियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । ऐसे में पढ़ने-पढ़ाने के माहौल के साथ खेलने के माहौल को प्रोत्साहित करने के लिए 'विद्या संबल योजना' की तर्ज पर "खेल संबल योजना" पर भी विचार होना चाहिए।
इससे एक तरफ प्रोफेसर्स शैक्षिक गतिविधियों को अपना समस्त ध्यान देकर नई ऊंचाइयां दे पाएंगे और दूसरी तरफ बहुत सारे खेल प्रशिक्षक अवसर पाकर खेल की प्रतिभाओं को भी निखार सकेंगे।
व्यक्तित्व विकास के केंद्र शिक्षालय हर क्षेत्र की प्रतिभाओं को ध्यान देने की स्थिति में तो नहीं है किंतु प्राथमिकता से पढ़ाई को और उसके बाद खेल को गंभीरतापूर्वक ध्यान देना ही होगा। इसमें सरकार के साथ समाज की भी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
नागौर जैसे कई जगहों पर विद्यार्थियों के साथ अभिभावक भी प्रदर्शन करके मांग करने लगे हैं कि शिक्षकों को सिर्फ पढ़ाने का काम करने दिया जाए।कई राज्यों की सरकारों ने इस मांग पर गंभीरता से अमल करना भी शुरू कर दिया है।
इसके आगे खेल की प्रतिभाओं को निखारने के लिए विशेष खेल प्रशिक्षक और खेलने की सुविधाओं की मांग जोर पकड़ने लगी हैं। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे कि गीता पढ़ने की अपेक्षा फुटबॉल खेलने के द्वारा तुम स्वर्ग के समीप अधिक पहुंच सकोगे।(Be strong my young friends! you will be nearer to heaven through football than through the study of Geeta.)-
"काश! हमारे भारत में शास्त्र भी हो और शस्त्र भी हो
योग में पूरा डूबा रहे और भोग का सम्यक अस्त्र भी हो।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹