वज्रपात की इंतिहा
December 8, 2021अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि
"वज्रपात की इंतिहा"
CDS विपिन रावत और उनकी पत्नी समेत 13 अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ लोगों की हेलीकॉप्टर हादसे में हुई असामयिक मौत ने हम सभी देशवासियों को एक ऐसा जख्म दिया है, जो कभी भर नहीं सकता। सेना में पिताजी के होने के कारण कैप्टन, ब्रिगेडियर,जनरल जैसे शब्द अत्यंत गौरव और आदर के रूप में बचपन से ही मेरे हृदय में बसे हुए हैं। एक साथ देश की आन-बान-शान वाले ऐसे लोगों के अकस्मात् चले जाने के समाचार से दिल पर क्या गुजर रही है,उसे शब्दों में बताना मुश्किल है; किंतु इतने बड़े दर्द को बिना बताए चुपचाप सह जाना उससे भी ज्यादा मुश्किल है-
"न दर्द कम होगा और न आंसू थमेगा,
ये ऐसा जखम है जो न कभी भरेगा।।"
एक साथ कई घरों के चिराग ही नहीं बुझे हैं बल्कि कई दिलों के आदर्श भी ऐसे समय में हमें छोड़कर चले गए,जब उनके पास अभी देश को देने को बहुत कुछ शेष था।
एक पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल जेजे सिंह श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए और अपने जूनियर विपिन रावत जी को याद करते हुए कह रहे थे कि उन्हें "सैनिकों का जनरल" कहा जाता था क्योंकि उन्होंने सैनिकों के लिए इक्विपमेंट से लेकर कमिटमेंट तक का ख्याल रखा। अपनी अर्धांगिनी के साथ उनका इस दुनिया से चले जाना अत्यंत दुखद है।
उनके श्रद्धांजलि के शब्द को सुनकर मेरे दिलो-दिमाग में एक विचार उठने लगा कि जो लोग अपने जीवनसाथी को छोड़कर अकेले महायात्रा पर निकल गए हैं, उन परिवारों का दुख भी कहां इससे थोड़ा भी कम है।
शादियों के इस मौसम में जब चारों तरफ जश्न का माहौल चल रहा है, हेलीकॉप्टर हादसे के इस गम में श्रृंगार के गाने भी वैराग्य के भाव को ही बढ़ा रहे हैं-
"राग का भाव न जो दिल में हमारे होता
फिर किसी साज में रागिनी नहीं होती।
मौत होती न सच्चाई जो अटल दुनिया की
जिंदगी बुद्ध सी संन्यासिनी नहीं होती।।"
इस राग और वैराग्य के बीच में दोलायमान मन किंकर्तव्यविमूढ़ हो चुका है। 'आज मेरे यार की शादी है... गाने का बोल कानों को सुनाई पड़ रहा हैै किंतु आंखों को एक साथ जलते हुए सपनों का मंजर भी दिखाई पड़ रहा है-
"लुटता कहीं पराग पवन में,कहीं चिता की राख है
किरण जादुई खड़ी कहीं पर, कहीं वितप्त सलाख है।
एक तरफ है फूल सेज पर,एक तरफ अंगार है,
विधना के बस इसी खेल में यह मिट्टी लाचार है।।"
अचानक छोड़कर जाने वाले भारत माता के इन महान विभूतियों को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि
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'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे