संवाद


"गीता :टूटे हुए मन का संबल"


आज तनाव चरम पर है। दुर्भाग्य के कारण हेलीकॉप्टर हादसे में देश के सैन्य प्रमुख व सैनिक अधिकारियों को हमने खो दिया तो दूसरी तरफ ओमिक्रोन के कारण एक दहशत का वातावरण चारों तरफ बनता जा रहा है।


लंबे समय से स्कूल बंद होने के कारण बच्चों की पढ़ाई छूट चुकी हैं और अब स्कूल भेजने पर वायरस का संकट सामने खड़ा दिख रहा है। बेरोजगारी चरम पर है और प्रतियोगी-परीक्षाएं भ्रष्टाचार की शिकार होती जा रही हैं। महंगाई ने जीना मुहाल कर दिया है।


लंबे संघर्ष के कारण लोग बाह्य और आंतरिक दोनों तरफ से टूट चुके हैं।


ऐसा लगता है कि पिछले 2 साल से जारी दुर्भाग्य और दहशत का वक्त बहुत लंबा हो गया और अब आगे हमलोग सह सकने की स्थिति में नहीं है।


किंतु पांडवों का वनवास तो 13 साल का था और अपमान तथा कष्ट भी अपनी सीमाएं लांघ चुके थे।


और जब निर्णायक युद्ध का क्षण आया तो अर्जुन जैसे महायोद्धा का तन और मन दोनों शिथिल हो गया।


उस दुर्भाग्य और दहशत के पल में सौभाग्य और सुकून यही था कि अर्जुन ने अपने सारथी श्री कृष्ण से यह पूछा कि इस संकट की घड़ी में मेरे को कोई रास्ता दिखाई नहीं देता; अतः क्या उचित है और क्या अनुचित,आप मार्गदर्शन दें।


तब श्री कृष्ण ने अर्जुन के टूटे हुए मन को अखंड बना दिया और उसके डिप्रेशन को डेयर(साहस) में बदल दिया-


"अपने रूग्ण विमूर्छित मन को प्राणवायु पहुंचाओ,


छिपा हुआ जो द्वंद्व उसे ही परमानंद बनाओ"


आज का व्यक्ति अर्जुन की दशा में पहुंच गया है किंतु किसी कृष्ण के समीप न होने के कारण विषाद से आत्महत्या की ओर जा रहा है।


डिप्रेशन के रास्ते आत्महत्या की ओर भी खुलते हैं और आत्मक्रांति की ओर भी।


महामारी के काल में आत्महत्या की संख्या में बहुत भारी बढ़ोतरी हुई है, यह कृष्ण और गीता दोनों का जीवन से गायब होने का परिणाम है। जब कोई रास्ता नहीं दिखता तो परमात्मा का रास्ता देखने वाली आंखें पैदा करने की जरूरत है। इसी को हमारी संस्कृति में श्रद्धा कहा गया है।


श्रद्धावान भारत अश्रद्धालु क्यूं हो?


"मैं पाबगिल हूं पर सितारों की बात करता हूं,


खिजांजदा हूं पर बहारों की बात करता हूं।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे


गीता-जयंती की शुभकामना🙏🌹