अद्भुत प्रेरक थे वागड़ के श्री गोविंद गुरु
December 19, 2021संवाद
"अद्भुत प्रेरक थे वागड़ के श्री गोविंद गुरु"
कल मैंने क्लास में विद्यार्थियों से श्री गोविंद गुरु के बारे में जानना चाहा तो उन्हें कुछ विशेष पता नहीं था जबकि उनके विश्वविद्यालय का नाम गोविंद गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय है।
नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी की दिव्य आत्माओं से परिचित कराना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। सिर्फ उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण से और भाषण से महापुरुषों की झलकें तो मिल जाती हैं लेकिन बहुत जल्दी गायब भी हो जाती हैं। जब तक इन महापुरुषों के सद्गुणों को जीने वाले आज के व्यक्तियों और घटनाओं को नई पीढ़ी की आंखों के सामने लाकर साक्षात् दर्शन नहीं कराया जाता तब तक उनका अंत:स्थल स्थाई रुप से प्रेरित नहीं होता।
अभी किसान आंदोलन चला जिसमें एक साल से महामारी के समय में सर्दी-गर्मी सभी मौसमों की प्रतिकूलताओं को झेलते हुए 700 से ज्यादा किसानों ने अपनी शहादत देकर एक मजबूत सरकार को कृषि कानून वापस लेने पर मजबूर कर दिया। सत्ता और गोदी मीडिया द्वारा दी गई हर चुनौती का अपनी एकता और सूझबूझ से इन किसानों ने सामना किया और सरकार ने भी इनके संकल्प के आगे झुक कर लोकतंत्र की गौरव-गरिमा को बढ़ाया।
इन किसानों के त्याग व संघर्ष को देख कर संत गोविंद के नेतृत्व में मानगढ़ धाम पर जमा होने वाले उन आदिवासी किसानों की याद आ गई जिन्होंने अपने बलिदान से जालियांवाला बाग में हुए शहादत के समकक्ष अपनी शौर्य-गाथा लिख दी थी।
गोविंद गिरी ने जब आदिवासियों को ढोल-मंजीरों की ताल पर भजन गा-गा कर स्वयं की बुराइयों और सरकार की बुराइयों के प्रति जगा कर इकट्ठा किया तो उस समय अत्यंत दमनकारी सरकार थी और प्रचार का कोई साधन न था। फिर भी हजारों लोगों को भगत बना कर और संप सभा का गठन कर मानगढ़ की पहाड़ियों पर प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर मेले का आयोजन कर जनजातीय समूह को विचार-विमर्श के लिए प्रेरित किया। ब्रिटिश राज और सामंत शाही ने अकाल के दौरान कर घटाने और उनकी धार्मिक और पारंपरिक स्वतंत्रता में दखल न देने की मांगों को विद्रोह समझा और उनको चारों तरफ से घेर कर मशीनगनें चलवा दीं।
मानगढ़ की पहाड़ियां लगभग 1500 आदिवासियों के खून से लाल हो गईं किंतु उनका बलिदान एक नया इतिहास लिख गया।
उस इतिहास के प्रेरणास्रोत श्री गोविंद गिरी सन्1858 के 20 दिसंबर को जन्मे थे।उस दिव्य आत्मा की बताई राहों पर चलकर स्वयं की बुराइयों और समाज व सरकार की बुराइयों के प्रति एकजुट होकर संघर्ष करने हेतु उनका जन्मदिवस विशेष संकल्प लेने का दिवस है। राष्ट्रकवि दिनकर के शब्दों में-
"कंकरियां जिनकी सेज सुघर
छाया देता केवल अंबर
विपदाएं दूध पिलाती हैं ,
लोरी आंधियां सुनाती हैं।
जो लाक्षागृह में जलते हैं ,
वे ही शूरमा निकलते हैं।।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे
श्री गोविंद गुरु के जन्मदिवस पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि🙏🌹