लोक-विमर्श के बाद बने कानून
December 23, 2021संवाद
"लोक-विमर्श के बाद बने कानून"
"राष्ट्रीय किसान दिवस" के शुभ अवसर पर यह विचारणीय है कि जिन कानूनों का सीधा रिश्ता समाज की परंपराओं और आजीविका के परंपरागत तरीकों से हों, उन्हें बनाने के पहले व्यापक लोक-विमर्श जरूरी है। किंतु देखने में यह आ रहा है कि-
"हमारे हक में अब इस तरह कानून आता है
गुलाब में कांटा ही सिर्फ नजर आता है।"
जबकि विधायन-पूर्व विमर्श नीति 2014 भी कहती है कि कानून बनाने के पहले संबंधित मंत्रालय कानून का हर मसौदा ,उसे लाने के कारण सामाजिक और आर्थिक लाभ-हानि का ब्यौरा कम से कम 30 दिन तक लोक- विमर्श के लिए वेबसाइट पर डालेगा और संवाद कराएगा।
एक साल से ऊपर चले किसान आंदोलन का सबसे बड़ा सबक यही है कि किसी भी कानून को लाने के पहले उस पर व्यापक विचार-विमर्श न हो तो अच्छी नीति में भी लोगों को बुरी नीयत नजर आने लगती है।
जनता के द्वारा जब जनता के लिए कोई मांग उठती है और उस पर विभिन्न विचार आते हैं तो जनमत का पता चल जाता है। फिर सरकार बहुमत के आधार पर जब उसे कानून का अमलीजामा पहनाती है तो उस कानून का विरोधी स्वर अत्यंत कमजोर और धीमा होता है।
यह सत्य है कि सामान्य जनता की समझ इतनी नहीं होती है कि वह अपने लिए भविष्योन्मुखी कल्याणकारी कानून के बारे में सोच सके। अतः विशेषज्ञों द्वारा सुझाव दिया जाता है। उन सुझावों में से कुछ प्रेय होते हैं और कुछ श्रेय होते हैं। प्रेय सुझावों को तो समर्थन मिल जाता है किंतु _श्रेय सुझावों को लागू करवाने के लिए जनमत को प्रशिक्षित करना पड़ता है।_
ऐसी परिस्थिति में शैक्षिक जगत के साथ सामाजिक सुधारकों और दबाव समूहों की बहुत बड़ी भूमिका हो जाती हैं।
सरकार के पक्ष को लगातार सुनने के बावजूद मन में यह प्रश्न उठता है कि यदि कृषि कानून किसानों के हित में थे तो सरकार उन्हें क्यों नहीं समझा सकी?
यदि इससे किसानों का बहुत बड़ा लाभ होता और उनके लिए अपने अनाज को अधिक दाम पर बेचने के लिए अधिक अवसर प्राप्त होते तो इसके विरोध में 700 से ऊपर किसानों को क्यूं शहादत देनी पड़ी?
सच कुछ भी हो किंतु सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि शक्तिशाली सरकार को भी किसान की मांग के आगे झुकना पड़ा। किसी की हार और जीत के रूप में देखने से ज्यादा इसे कानून बनाने के पहले व्यापक लोक-विमर्श की कमी के रूप में देखा जाना चाहिए।
जब तक जनता को मानसिक रुप से तैयार नहीं किया जाता तब तक अध्यादेश से अथवा जल्दबाजी में लाए गए कानूनों पर आंदोलन होता रहेगा और असमंजस की स्थितियां बरकरार रहेंगी।
किसानों ने भी आंदोलन खत्म होने की जगह स्थगन की घोषणा की है और सरकार ने भी कुछ लोगों को समझाने में असफल होने को ही माना है; अर्थात् स्थिति संघर्ष-विराम की है।
न्यायशास्त्र में एक कहावत प्रचलित है कि ऐसा कोई कानून न बनाएं जिनके अनुपालन की संभावनाएं क्षीण हों क्योंकि कानून के उल्लंघन से व्यवस्था पर से विश्वास उठ जाता है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे
राष्ट्रीय किसान दिवस की शुभकामना🙏🌹