इक्कीस की टीस
December 29, 2021संवाद
"इक्कीस की टीस"
पूरा विश्व 2021की टीस को महसूस कर रहा है। सिर्फ भारत महसूस करने के बावजूद उसे इनकार क्यूं कर रहा है?
'असतो मा सद्गमय' की प्रार्थना करने वाला देश असत्य से सत्य की ओर जाने के बजाय बड़े असत्य की ओर कदम बढ़ा रहा है।
"ऑक्सीजन की कमी से कोई नहीं मरा" यह वाक्य सोते-जागते, उठते बैठते हर पल मस्तिष्क में गूंजता रहता है।
तर्क,रिपोर्ट और बहुमत के आधार पर यदि सत्य का निर्णय हो तो 'सत्यमेव जयते' के देश में यह सफेद झूठ ही सबसे बड़ा सत्य है।
पानी में सीधी लकड़ी भी टेढ़ी दिखाई देती है। इससे लकड़ी टेढ़ी नहीं हो जाती।
आंकड़ों की बाजीगरी से मुक्त हुए बिना भारत का कल्याण नहीं है। भारतीय संस्कृति दृश्य से ज्यादा महत्वपूर्ण अदृश्य को मानती है। अतः न्याय के लिए हम परमात्मा से गुहार लगाते हैं। इस जगत की व्यवस्था में निर्णय होता है,न्याय नहीं।
जिन घरों के परिजनों ने ऑक्सीजन के अभाव में तड़प-तड़प कर दम तोड़ा है, उन लोगों पर इस वाक्य को सुनने के बाद क्या गुजरी है, हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
'डॉक्टर के रूप में यह मेरे जीवन का सबसे काला दिन है, जिसमें ऑक्सीजन के अभाव में हम अपने सामने मरीजों को घुट-घुट कर मरते देख रहे हैं'-यह कहते हुए टीवी पर जिन डॉक्टरों ने खून के आंसू रोए, उनको कैसे भुलाया जा सकता है?
ऑक्सीजन बेड न मिलने पर जब आगरा की रेणु सिंघल सांस के लिए तड़पते अपने पति को मुंह खोल कर अपने मुंह से सांस भरने लगी, उस दृश्य को आंखों से कैसे हटाया जा सकता है?-
"हजारों बेबस आहें दफन है यहां,
महज पत्थरों के ढेर नहीं है ये मजारें लोगों।
सत्य कितना भी दुखदायी हो किंतु मुक्ति का रास्ता दिखाता है। लेकिन जब हम सफेद झूठ को सच साबित करने में लग जाते हैं तो स्वयं को ही धोखा देने लगते हैं।
इससे समस्या का समाधान नहीं मिलता बल्कि समस्या और बड़े विकराल रूप में फिर से खड़ी हो जाती है-
क्या गुजरेगी सफीने पर खबर नहीं,
अंधड़ से मिल गई हैं पतवारें लोगों।।
सत्य का स्वीकार ही मृत-आत्माओं के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
"शिष्य-गुरु संवाद" से डॉ. सर्वजीत दुबे
अलविदा 2021🙏🌹