संवाद


"आशंका के बीच आशा का सूरज"


नए वर्ष का सूरज ओमिक्रोन की आशंका के बीच उदित हो रहा है। दूसरी लहर के दिए जख्म को भुलाने के लिए हम सभी ने काफी उत्साह और उमंग से जिंदगी को फिर से जीना शुरु किया था-


चाहे जैसे भी हो हालात दिल लगाना चाहिए


जिंदगी से प्यार का कुछ पल चुराना चाहिए ... के भाव के साथ हर पल का पूर्ण लुत्फ पूरी तन्मयता के साथ हर शख्स उठा रहा था।


विकास की गाड़ी रफ्तार पकड़ रही थी, बाजारों में रौनक लौट रही थी, स्कूलों में घंटियां बजनी शुरू हो गई थीं, शहनाईयों की आवाज से वातावरण गुंजायमान हो गया था कि अचानक सब कुछ पर ब्रेक लगाने की बात होने लगी।


महामारी ने यह एहसास करा दिया कि विश्व इतना एक दूसरे से जुड़ा हुआ है कि दक्षिण अफ्रीका का नया वेरिएंट सूदूर पूरब के दरवाजे पर पलक झपकते पैर पसारने लगता है।


हमारी धार्मिक-दृष्टि ने तो बहुत पहले कहा था कि- 'पुत्रो अहं पृथिव्या: 'किंतु राजनीतिक-दृष्टि ने छोटे-छोटे खंडों में बांटकर उस पृथ्वी-माता का जितना दोहन हो सकता था,उतना किया। जिन्हें हम विकसित देश कहते थे,इस जलवायु परिवर्तन और महामारी के काल में उनकी विकास की दृष्टि प्रश्नों के घेरे में खड़ी हैं।


नई पीढ़ी ग्रेटा की आवाज में विश्व के नेताओं से पूछ रही है कि यह कैसी दुनिया हमें दी,जिसमें न पीने को साफ जल है और न श्वास लेने को शुद्ध हवा।


मानव-अस्तित्व पर मंडरा रहे आशंका के बादलों के बीच नया वर्ष का जो नया सूरज उगेगा,वो नई पीढ़ी की नई रोशनी से लबरेज होगा।


कई जगह पर युवाओं ने अपने हाथों में कमान ले ली हैं,जिसके तहत वे पेड़ लगाने से लेकर जंगल बचाने तक के अपने अभियान को अपना सर्वस्व समर्पित कर रहे हैं। एक पृथ्वी,एक आकाश,एक सागर और सह-अस्तित्व को ध्यान में रखकर विकास की एक नई दृष्टि विकसित करने हेतु युवाओं का यह प्रयास बर्बाद हो चुके इकोसिस्टम को बचाने की दिशा में आशा की सबसे बड़ी किरण है।


विनाश की आशंका के बीच नई पीढ़ी के सृजन की मुहिम से जो आशा जगती है,वो नए वर्ष के स्वागत के लिए बाहें फैलाने को कह रही है-


"हरी-भरी धरती,खुला आकाश


बाहें फैला कर बुलाता है पास


जुड़े हैं सबके श्वासों से श्वास


अद्वैत से ही हर पूरी होगी आस।"


अद्वैत का दर्शन ही महामारी को महाजीवन में बदल सकता है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे


नव वर्ष मंगलमय हो🙏🌹