तीसरी लहर का स्वागत है
January 8, 2022संवाद
"तीसरी लहर का स्वागत है"
व्यंग्य में दिया गया यह 'शीर्षक' नहीं है बल्कि हालातों पर गहरी नजर रखने के बाद बड़ी पीड़ा में से निकला यह निष्कर्ष है। कॉलेज में सहकर्मी की रिपोर्ट पॉजिटिव आते ही विद्यार्थियों तथा स्टाफ में हड़कंप मच गया। चलती हुई सभी क्लासेज बंद कर तुरंत सैनेटाइजेशन का काम किया गया। एक शिक्षक के संपर्क में विद्यार्थी एवं सहकर्मी सभी थे। संपर्क में आने के आधार पर किसका-किसका टेस्ट करवाया जाए?
"रात में कर्फ्यू और दिन में भीड़" को देखकर महामारी विशेषज्ञ बार-बार यह चेतावनी दे रहे थे कि यह तो खुलेआम कोरोना को निमंत्रण है।
अर्श से फर्श तक के सभी लोगों ने कोविड-प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ा दी हैं। नियमों में और कागजों में महामारी से लड़ते हुए दिखने का नाटक किया जा रहा था जबकि आचरण तथा व्यवहार में दोनों हाथों से उसे बुलाया जा रहा था।
एक तो हिंदुस्तान की जनसंख्या इतनी हो गई है कि जहां भी लोग खड़े हो जाएं वहां रैली की जगह रैला नजर आने लगता है। किंतु हमारे माननीय-नेताओं को महारैला से कम कुछ भी मंजूर नहीं है। युद्धस्तर पर भीड़ जुटाने की तैयारी की जाती है और बिना मास्क और बिना दूरी के खड़ी जनता को इस संबंध में एक भी शब्द नहीं बोला जाता है।
दूसरी तरफ जनता जनार्दन भी बाजारों में या रैलियों में जहां भी भीड़ हो,वहां ऐसे खिंची चली आती है कि मानो समुद्र-मंथन के बाद अमृत के कलश की कुछ बूंदे बांटी जाने वाली हैं।
मास्क पहनने की औपचारिकता को पूरा करने के नाम पर रोकने या टोकने पर जेब में से पड़े मास्क को निकालते हैं अथवा नाक के नीचे गिरे मास्क को नाक के ऊपर चढ़ा कर दिखा देते हैं। पूछने पर जनता बताती हैं कि हमारे नेता भी भारी भीड़ में मंच पर भाषण देने के समय मास्क नहीं रखते हैं और कोरोना की वर्चुअल-मीटिंग के दौरान अकेले में मास्क पहनकर अपनी तैयारियों को बताते हैं।
अमेरिका में प्रतिदिन 10 लाख केस मिल रहे हैं जबकि आबादी 30 करोड़ है। भारत की आबादी 135 करोड़ हैं और ओमिक्रोन के संक्रमण की रफ्तार अप्रत्याशित है।
हमारी लापरवाही,हमारी आबादी और हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था को देखते हुए यह भविष्यवाणी की जा सकती है कि आगे के कुछ दिन बहुत भयावह मंजर दिखाने वाले हैं। जानकार आशंका व्यक्त कर रहे हैं कि शिक्षालयों में और खेल के मैदानों में भी कोविड-अस्पताल बनाने के बावजूद जगह की कमी पड़ जाएगी और चारों तरफ अफरातफरी का आलम होगा। अन्य रोगों से मरने वाले रोगियों की गणना भी कोरोना संक्रमितों में की जाएगी और प्रतिदिन के बढ़ते आंकड़े दहशत को चरम पर पहुंचा देंगे।
ऐसे में हमारा फर्ज क्या है?
तेरे हाथ में पत्थर और मेरे हाथ में पत्थर
जरा तू भी सोच ,जरा मैं भी सोचूं।
तेरे भी शीशे के घर और मेरे भी शीशे के घर
जरा तू भी सोच,जरा मैं भी सोचूं।।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे
मास्क और दूरी
हर पल जरूरी 🙏🌹