अदृश्य डोर से जुड़ी जीवन पतंग
January 14, 2022संवाद
"अदृश्य डोर से जुड़ी जीवन पतंग"
मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर आकाश पतंगों से पटा हुआ है। निराशा और अवसाद के वातावरण पर उमंग और उल्लास भारी पड़ता दिख रहा है। जरूर कोई अदृश्य डोर है जो इस जीवन रूपी पतंग को आकाश में उड़ाए रखती है।
पहली लहर, दूसरी लहर,तीसरी लहर.... न जाने कितनी लहरों ने इस जीवन रूपी पतंग को काटने का प्रयास किया। किंतु महामारी के अंधेरे को चीरकर फिर से जीवन का सूरज निकल आता है।
कई पतंगें कट भी जाती हैं और कई पतंगें उड़ भी नहीं पाती हैं; ऐसे पतंगों के रिश्तों की डोर या तो कमजोर होती है या हवाएं उनका साथ छोड़ देती हैं-
न कोई उमंग है, न कोई तरंग है
मेरी जिंदगी भी क्या एक कटी पतंग है
किंतु इस कटी पतंग को लेने के लिए कई लोग दौड़ पड़ते हैं। जो इस कटी पतंग को लूट लेता है,उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता। लेकिन कभी-कभी तो उस कटी पतंग की किस्मत ऐसी होती है कि कई दावेदारों के हाथों में पड़कर किसी की नहीं बनती और स्वयं भी कई टुकड़ों में बंट जाती हैं। ऐसी पतंगों को देखकर हृदय में यह भाव उठता है कि-
मिटा-मिटा कर दुनिया फिर से बनाई जाती है
जरूर कुछ कमी है जो बार-बार पाई जाती है।
समय और महामारी ने जीवन के रिश्तों की डोर को कहीं कमजोर कर दिया है तो कहीं तोड़ कर रख दिया है ; फिर भी परमात्मा रूपी अदृश्य डोर को जो ढूंढ लेता है उसी की जीवन रूपी पतंग बच पाती है या उड़ पाती है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे
मकर संक्रांति की शुभकामना🙏🌹