संवाद


"गोल्ड-मेडल: उपलब्धि और चुनौती"


दीक्षांत समारोह में माननीयों के कर कमलों से गोल्ड-मेडल पाकर विद्यार्थी के जीवन को एक नया प्रकाश मिलता है। इसके लिए विश्वविद्यालय और गोल्ड-मेडलिस्ट विद्यार्थी दोनों बधाई के पात्र हैं। विश्वविद्यालय की मेहनत से समाज के समक्ष कुछ प्रकाश-स्तंभ उभर कर आते हैं, जिनसे बड़ी अपेक्षा होती है। विश्वविद्यालय जिन कसौटियों पर सोने को कसता है,उन कसौटियों से निकले सोने उसकी विशेष पहचान होते हैं।


किंतु स्वर्ण-पदक की चमक अब बहुत जल्दी फीकी पड़ जाती है, उस पर बहुत गहराई से विचार करने का समय आ गया है;क्योंकि-


विश्वविद्यालय का गोल्ड-मेडलिस्ट सड़क पर खड़ा था


उपाधियों के ढेर तले उसका अरमान पड़ा था


पुराने जमाने में गोल्ड- मेडलिस्ट को दूसरे दिन से उसी विश्वविद्यालय द्वारा शिक्षण कार्य के लिए आमंत्रित कर लिया जाता था। किसान भी जब अपना सबसे अच्छा बीज अगली फसल के लिए सुरक्षित कर लेता है तो विश्वविद्यालय ऐसा क्यों नहीं करे। कालक्रम से उसकी स्थाई नियुक्ति सुनिश्चित हो जाती थी।


ऐसे गोल्ड-मेडलिस्ट प्रशासनिक आदि क्षेत्रों में जाने का अवसर मिलने पर भी उसे छोड़ दिया करते थे। क्योंकि वर्षों तक कठिन तपस्या के बल पर अध्ययन-अध्यापन में जो उसे महारत हासिल हुई थी,उसका सर्वाधिक सदुपयोग शिक्षा-क्षेत्र में ही संभव था।


अध्ययन-अध्यापन और शोध-परक वातावरण के कारण विश्वविद्यालय की कीर्ति दूर-दूर तक फैल जाती थी जो देश-विदेश की प्रतिभाओं को भी आकर्षित कर लिया करती थी।


किंतु अब हालात बहुत बदल गए है। जिस संस्थान ने गोल्ड-मेडल दिया है, अब वही संस्थान उसकी प्रतिभा पर विश्वास नहीं करता। अब गोल्ड-मेडलिस्ट सारी परीक्षाओं के फॉर्म भरता है- क्लर्क से लेकर कलेक्टर तक की परीक्षा का। नौकरी के लिए दर-दर की ठोकरें खाता है।


बरसों बाद वह इस नतीजे पर पहुंचता है कि जीवन की यह सबसे बड़ी उपलब्धि सबसे बड़ी चुनौती सिद्ध हुई। विश्वविद्यालय द्वारा गोल्ड-मेडल दिए जाने के बाद उसके सपने आकाश छूने लगे थे किंतु व्यवस्था कुछ इस तरह की बनी है कि बाहरी प्रतियोगिता-परीक्षा द्वारा उसे मिट्टी के मेडल भी नसीब नहीं हो रहा। विश्वविद्यालय की परीक्षा प्रणाली और नौकरी की प्रतियोगिता परीक्षा प्रणाली में इतना भारी अंतर उसे कुछ समझ नहीं पड़ता।


बहुत सारी रिपोर्टों में यह निष्कर्ष आया है कि बहुत सारे गोल्ड मेडलिस्ट जीवन से हताश होकर अवसाद या आत्महत्या का शिकार हो रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं हुआ-


परीक्षा जिंदगी की आज वह फेल हो गया था


अनमोल सा हीरा बेमोल सेल हो गया था ।।


अब इस अन्याय का जिम्मेदार University exam system है या competitive exam system ?


विश्वविद्यालय, गोल्ड-मेडलिस्ट विद्यार्थी,समाज और सरकार सभी इस बात पर गंभीर मंथन करें जिससे कि हमारे सोने (Golden-students) सभी परीक्षाओं और अपेक्षाओं पर खरे उतर सकें।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे


Congratulations🙏🌹