संवाद


"चिड़ियों की चाहत आकाश में चहचहाने की"


'राष्ट्रीय बालिका दिवस' लड़कियों की स्थिति पर एक विचार का दिवस है। जिन लड़कियों को मां-बाप का प्यार और सहयोग मिला, उन लड़कियों ने आकाश की बुलंदियां छू लीं। चाहे देश की धरती पर इंदिरा गांधी का उदाहरण लें या विदेशी धरती अमेरिका जाकर उपराष्ट्रपति बनीं कमला हैरिस का उदाहरण लें; ये दोनों उदाहरण एक बहुत बड़ी आशा का संचार करते हैं।


सामान्य घर की लड़कियों को भी जब सहयोग मिला तो पढ़ाई ही नहीं,खेल में भी उनका प्रदर्शन चौंकाने वाला रहा।परीक्षाओं के रिजल्ट में लड़कियों का अव्वल आना हो या ओलंपिक में महिला हॉकी टीम का दिल जीतने वाला प्रदर्शन दिखाना हो; यह साबित करने के लिए काफी है कि परमात्मा ने तो हर चिड़ियां को बाज बनने की सामर्थ्य दे रखी है, किंतु सोच से निर्धारित होता है कि वह चिड़िया आकाश छुए या किसी घोंसले में बंद होकर उड़ना ही भूल जाए-


"बाबुल तेरी बगिया में चहचहाना मैं भी चाहती हूं,


बाहर निकल कर सपने सजाना मैं भी चाहती हूं।"


गहरे में झांकने का अवसर मिला तो एक अनूठा अनुभव मेरे ध्यान में यह आया कि जो भी मां-बाप लड़के लड़कियों में भेद नहीं करते हैं, ऐसे घरों में लड़कियों के कारण ज्यादा प्रेम और शांति का वातावरण निर्माण करने में सफलता मिली है। सिर्फ लड़कियों वाले मां-बाप तो अपेक्षाकृत ज्यादा सुखी है।शिक्षा और जागरूकता से यह अंतर आया है।


किंतु अभी भी समाज की सामूहिक सोच लड़कियों को पराया धन समझने की है और जल्द से शादी करके उससे मुक्ति पाने की है। ऐसे में लड़कियों की शादी की उम्र 21 करने से विरोध का स्वर उठना स्वाभाविक है। लेकिन लड़कियों की निशुल्क शिक्षा की गुणवत्तापूर्ण व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके तो धीरे-धीरे समाज का वातावरण बदल सकता है।


आदिवासी अंचल में कन्या महाविद्यालय के शिक्षक के रूप में मुझे यह अनुभव मिला कि परिवार की आर्थिक मजबूरी और पुरुष सदस्यों की नशाखोरी के कारण प्रतिभा होने के बावजूद लड़कियां आगे नहीं बढ़ पा रहीं। नामांकन का प्रतिशत तो हर वर्ष निश्चितरूपेण बढ़ रहा किंतु शिक्षा की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिए बिना सोच का बदलना और बढ़ना संभव नहीं है।


एक तरफ लड़कियों के प्रति दुराचार की घटनाएं बढ़ रही हैं तो दूसरी तरफ लड़कियां इन सबके बावजूद आगे बढ़ रही हैं। यह द्वंद्व आगे भी जारी रहेगा। स्वयं की सोच और समाज की सोच यदि सकारात्मक होगा तो लड़कियों की शिक्षा और सशक्तता से एक शिक्षित और सशक्त समाज का निर्माण संभव होगा-


"इस पुनीत यज्ञ में आहुति तो सबको देनी होगी


उनके प्रति हर को अपनी सोच बदलनी होगी।।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे


बालिका दिवस की शुभकामना🙏🌹