संवाद


"नए महात्मा की खोज"


हे राम!


हिंदुस्तान अपने ही महापुरुषों का कद छोटा करने में गर्व का अनुभव कर रहा है।


आपने तो अपने भ्राता लक्ष्मण को रावण से भी कुछ विद्या सीख लेने के लिए उनके चरणों में भेज दिया था। किंतु हम रामभक्त अपने दिवंगत महात्मा से कुछ सीखने की जगह उनको सुधारने में लग गए हैं।


लोग तो यहां तक कहने लग गए हैं कि गांधी का कोई योगदान भारत की स्वतंत्रता में था ही नहीं और सत्य-प्रेम-अहिंसा के रास्ते से भारत कायर बन जाएगा।


क्या प्रेम और करुणा की मूर्ति होने के बावजूद आपने अपनी सेना का गठन तथा शस्त्रास्त्रों का संग्रह व उपयोग नहीं किया?


आज हिंदुस्तान को कौन समझाए कि दरअसल दीन-हीन भारत को खड़ा करने के लिए सबसे पहले आंतरिक-बल की जरूरत थी। सत्य-प्रेम-अहिंसा ने वह आत्मबल दिया,जिसके बल पर नर-नारी और बाल-वृद्ध सभी भारत के स्वतंत्रता की आवाज उठाने लगे और एक आह्वान पर घर से बाहर आने लगे।


तब एक ऐसी स्थिति बन गई कि प्रथम विश्वयुद्ध में सैनिकों की ब्रिटिश फौज में भर्ती के लिए गांधी ने आह्वान किया। नेता जी ने भी ऐसे ही सैनिकों से आजाद हिंद फौज खड़ा किया था।


वर्तमान की पीढ़ी अपने भविष्य को लेकर बहुत असुरक्षित महसूस कर रही हैं, ऐसे में अतीत की पीढ़ी से कुछ सीखकर वर्तमान को सजाया संवारा जाए ताकि भविष्य सुनहरा बन सके-


"कुछ अंधेरे रोशनी के साथ आते हैं


कुछ उजाले हैं क़ि साए छोड़ जाते हैं।"


साधारण से असाधारण बनने वाले गांधी के भी कुछ अंधकारपूर्ण-पक्ष हैं जिनकी खुलेआम स्वीकृति कर वे मोहन से महात्मा बन गए। जो शख्स कभी आत्मालोचना से नहीं डरा,वह समालोचना से क्या डरता।


किंतु आज उनकी निरर्थक आलोचना करके किस सार्थकता की खोज में हिंदुस्तान है? अतीतगामी-दृष्टि की जगह भविष्योन्मुखी-दृष्टि वाला देश ही विकास की दौड़ में आगे निकल सकता है-


एक वे हैं पांव कल की सीढ़ियों पर हैं,


एक हम इतिहास पर जिल्दें चढ़ाते हैं।


पुराने सभी महापुरुषों के प्रति श्रद्धाभाव रखते हुए उनसे शिक्षा लेकर नए महात्मा पैदा करने की जरूरत है क्योंकि नई पीढ़ी नए आदर्श की खोज में है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे


भावपूर्ण श्रद्धांजलि🙏🌹