पढ़कर क्या होगा?
February 1, 2022संवाद
"पढ़कर क्या होगा?"
इतने अच्छे विद्यार्थी होने के बावजूद तुम क्लास में क्यों नहीं आ रहे हो? यह पूछने पर जवाब आया कि सर! पढ़कर क्या होगा? एक तो इस डिग्री की कोई वैल्यू नहीं और दूसरा नौकरी देने वाली परीक्षाओं का हाल सबके सामने है।
शिक्षक के रूप में विद्यार्थी का यह उत्तर सुनकर मैं सन्न रह गया। काफी देर तक गुमसुम रहा। फिर दिलो-दिमाग में एक प्रश्न गूंजने लगा कि क्या शिक्षा का संबंध सिर्फ डिग्री से ही है?
जब तक इस प्रश्न पर विचार कर रहा था,तब तक दूसरा प्रश्न उभर आया कि समय पर चुनाव करवाने में जो व्यवस्था सफल हो जाती है, वही व्यवस्था समय पर परीक्षा करवाने में असफल क्यों हो रही है?
शिक्षा और व्यवस्था जब दोनों से युवा हताश हो जाएं तो समझिए देश बहुत बड़े संकट में हैं-
"नौजवान फंदे पर लटका पड़ा था,
मां-बाप का यह अरमान खड़ा था।"
मैं स्वयं और मेरे साथी इसी शिक्षा-व्यवस्था से डिग्री लेकर नौकरी पाने में सफल रहे, भले ही इसके लिए पचासों परीक्षाएं देनी पड़ी हों। किंतु उस समय हमारे शिक्षकों की क्लास भी होती थी, परीक्षा भी होती थी , समय पर रिजल्ट भी आता था और ज्वाइनिंग भी मिलती थी।
इधर कुछ वर्षों से शिक्षा संस्थानों में पुराने शिक्षकों के सेवानिवृत्त हो जाने से शिक्षक भी कम होते गए और भर्तियां भी निकलनी बंद हो गईं। महामारी ने इस समस्या को और विकराल बना दिया। परीक्षा कराने वाली व्यवस्था ने तो समस्या को चरम पर पहुंचा दिया।
मेरे परिवार और रिश्तेदारी में कम से कम 20 युवा ऐसे हैं, जिनकी प्रतिभा और परिश्रम में कमी नहीं दिखती। किंतु नौकरी की आस उनकी छूटती दिखाई दे रही है।गहन अंधेरा उनके चारों ओर घिरता दिखाई दे रहा है। शादी की उम्र उनकी खिसकती जा रही है और घर की जमा-पूंजी खत्म होती जा रही है।
जब उनको धैर्य रखने की बात मैंने कही तो उनका जवाब था- "2019 की परीक्षा 2022 तक पूर्ण नहीं होती और हर परीक्षा के पहले पेपर लीक हो जाता है; और आप कहते हैं धैर्य रखें, आखिर कितना और कब तक?
आप भी अपने परिवार और रिश्तेदारी में ऐसे युवाओं की गिनती कर लें और उनके सीने में धधकती आग को महसूस करें। इसके पहले कि उस आग में वे स्वयं को जलाएं या दूसरे को जलाएं; शिक्षा और व्यवस्था आशा का कोई दीप जलाएं।-
"माना कि अंधेरा बड़ा और घना है
पर सदा के लिए थोड़े ही बना है।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹