संवाद


"सरस्वती-पुत्र का सपना"


सपने में मां शारदे को पाकर शिक्षक की खुशी का ठिकाना न रहा। "कोई वरदान मांग लो,पुत्र!"- यह सुनकर तो सरस्वती-पुत्र की आंखों में आंसू आ गए।


हे पुस्तकधारिणी! बस एक ही वरदान मांगता हूं- "हमें पढ़ाने दो।"


वीणापाणि ने अचरज भाव से पूछा-पुत्र! तुम्हें पढ़ाने से कौन रोक सकता है और कैसे रोक सकता है?


शिक्षक -हे वीणावादिनी!आश्चर्य में डालने वाले नित नए-नए सरकारीआदेश हमें पढ़ाने नहीं देते। कभी हमारी ड्यूटी पोषाहार में लगा दी जाती है तो कभी बीएलओ के रूप में; कहीं खुले में शौच को रोकने के लिए ड्यूटी लगा दी जाती है तो कहीं पराली जलाने से रोकने के लिए; कभी आधार कार्ड बनवाने में ड्यूटी लगा दी जाती है तो कभी वोटर आई कार्ड बनवाने में; कहीं जनगणना में ड्यूटी लगा दी जाती है तो कहीं पशुगणना में। आपदा काल में तो हमने दिन-रात कई प्रकार की ड्यूटी दी ही किंतु बिहार में अब हमें शराब की जासूसी में लगाने की तैयारी है।


मां सरस्वती भी आश्चर्य में पड़ गई और पूछी कि फिर शिक्षालय में क्या करते हो?


विनीतभाव से शिक्षक बोला- शिक्षालय का समय तो अनावश्यक सूचनाओं को ऑनलाइन और ऑफलाइन तैयार करने और भेजने में बीत जाता है।


घोर आश्चर्य की भावभंगिमा उभरने से श्वेतवस्त्रधारिणी का मुखमंडल मलिन हो गया और उनके मुख से मद्धिम सा स्वर निकला- फिर अगली पीढ़ी का क्या होगा?


शिक्षक -मां!सरकार उन्हें आत्मनिर्भर बनाना चाहती है।


मां शारदे -क्या कोई न्यायिक-व्यवस्था धरती पर नहीं है?


शिक्षक - इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विवेक चौधरी की पीठ ने चारु गौर की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम- 2009 के नियम 27 के अनुसार शिक्षकों की ड्यूटी गैर शैक्षणिक कार्य में नहीं लगाई जा सकती है। शिक्षकों से सिर्फ आपदा,जनगणना और सामान्य निर्वाचन के दौरान ही कार्य लिया जा सकता है।


उच्चतम न्यायालय का भी यह निर्देश है- "चुनाव ड्यूटी और सर्वेक्षण करने से संबंधित न्यूनतम कार्यों के अलावा शिक्षकों को स्कूल के समय के दौरान ऐसी किसी भी गैर शैक्षणिक गतिविधि में भाग लेने के लिए न तो अनुरोध किया जाएगा और न ही अनुमति दी जाएगी जो शिक्षक के रूप में उनकी क्षमताओं को प्रभावित करती हो।


मां सरस्वती -क्या न्यायालय के निर्णयों की पालना नहीं की जाती?


शिक्षक -न्यायालय की अवमानना से बचने हेतु निर्देशों की पालना करने का नाटक किया जाता है।


मां शारदे - बच्चे और उनके परिवार वाले पढ़ने और पढ़ाने के लिए क्या कोई आवाज नहीं उठाते?


शिक्षक -मां!गरीबों की आवाज को इस दुनिया में कौन सुनता है?


नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी गैर शैक्षणिक गतिविधियों से शिक्षकों को पूरी तरह से अलग करने का सुझाव दिया गया है। किंतु ऐसा सुझाव क्रियान्वित कभी नहीं किया जाता।


स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या घटने पर और खराब रिजल्ट आने पर कुछ समय के लिए अध्ययन-अध्यापन पर ध्यान दिए जाने का कोई विशेष कार्यक्रम चला दिया जाता है; और वह भी अधिकतर कागजों में।


अतः मां!तू ही अंतिम आशा है। "हमें पढ़ाने दो" का वरदान दे दो।


सरस्वती पुत्र के मुखारविंद से शिक्षा की दुर्दशा को सुनकर मां सरस्वती अंतर्ध्यान हो गईं। तभी आकाशवाणी हुई-


"पीढ़ियां हो रही बर्बाद क्यूं हैं?- सोचना होगा


सरस्वतीपुत्र सब लाचार क्यूं हैं?-सोचना होगा।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे


बसंत पंचमी की शुभकामना🙏🌹