आवाज ही पहचान और जीवन ही संदेश
February 6, 2022"आवाज ही पहचान और जीवन ही संदेश"
आज मां सरस्वती की प्रतिमा का विसर्जन दिवस था किंतु मां सरस्वती की साक्षात् प्रतिमूर्ति सुर-साधिका लता दी भी पंचतत्व में विलीन/विसर्जित हो गईं; यह केवल संयोग था या कुछ और?
मेरा हृदय इसे केवल संयोग मानने को तैयार नहीं है। रहस्यदर्शी कहते हैं कि तन-मन-प्राण से व्यक्ति जिसकी उपासना करता है, उसके साथ उसकी एकात्मता घटित हो जाती है।
भले ही स्वर-सम्राज्ञी का तन अब शेष नहीं रहा किंतु उनका मन को हरने वाला और प्राण को स्पंदित करने वाला गान फिजाओं में रच-बस गया।
जन्म के साथ ही मृत्यु निश्चित हो जाती है किंतु भारत के ऋषि कहते हैं कि हे प्रभु! मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो। मेरी अंतरात्मा कहती है कि लता जी अपने प्रभु कुंज से एक संघर्षशील , सृजनशील और प्रेमपूर्ण जीवन को भरपूर जी कर अमृत की ओर जाने का हमें रास्ता बता गईं।
आज भी भारत में सुर और असुर के बीच एक सनातन संघर्ष चल रहा है। भारत रत्न लता जी का जीवन कहता है कि सुर को बहुत साधना पड़ेगा; फिर कंठ से ऐसी दिव्य-वाणी झरती है,जिसे सुनकर दिलों को सुकून मिलता है और प्रेम गंगा में सब डूबने लगते हैं।
यदि सुर बिना सधा अर्थात् असुर रह गया तो उसी कंठ से कड़वे बोल निकलते हैं और दिलों के बीच की दूरियां बढ़ा जाते हैं।
स्वर कोकिला के देह त्यागने की खबर सुनकर क्या आम और क्या खास;सभी उनके अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़े।
मेरे जैसे जो लोग वहां पहुंच नहीं सकते थे, दूरदर्शन से उनके महाप्रयाण का दर्शन अंतिम क्षणों तक बिना पलक झपकाए करते रहे। जिनको न सुर का भान और न संगीत का ज्ञान था, लता दी की आवाज उनके भी दिल को छू जाती थी।
आखिर कौन सा आकर्षण जाति-धर्म-लिंग-क्षेत्र इत्यादि की दीवारें गिरा देता है? वह आकर्षण है- पवित्रता और सृजनशीलता का।
लगता है जिस आत्मा में ये दोनों गुण होते हैं, उस आत्मा को परमात्मा की सारी शक्ति प्राप्त हो जाती है। तभी तो कोई वैज्ञानिक होकर भारत रत्न बन जाता है तो कोई कला को लेकर; कोई खिलाड़ी होकर भारत रत्न बन जाता है तो कोई सेवा का भाव लेकर; लेकिन सब महान आत्माओं में पवित्रता और सृजनशीलता दिखाई देती हैं।
अन्यथा एक साधारण से मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लेकर और अल्प आयु में अपने पिता को खोकर सारे परिवार की जिम्मेदारियों को उठाते हुए कोई फर्श से अर्श तक की यात्रा कैसे कर लेता। कितने कवियों के गीतों को लता जी ने अपने होठों से छू कर अमर कर दिया और कितनी नई नायिकाओं को बैकग्राउंड से दी गई अपनी आवाज के जादू से रातोंरात सितारा बना दिया।
भावहीन,रसहीन और तरन्नुमहीन होते जा रहे भारत को भावपूर्ण, रसपूर्ण और तरन्नुमपूर्ण होने के लिए भारत के इस अनमोल रतन से बहुत कुछ सीखना होगा; अन्यथा सुर और असुर के संग्राम में असुर भारी पड़ सकते हैं।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे
भावभीनी श्रद्धांजलि🙏🌹