मरघट का मसीहा
February 6, 2022संवाद
"मरघट का मसीहा"
महामारी की दूसरी लहर ने जो सबसे कड़ी चुनौती पेश की-वह थी कोरोना से मरने वालों के अंतिम संस्कार की। संक्रमित होने का खौफ इतना कि परायों का तो कहना ही क्या, अपनों ने भी साथ छोड़ दिया। शव लेने से लोग इनकार करने लगे, मरघट तक जाने की तो बात बहुत दूर।
मृत्यु के इस हृदय-विदारक-तांडव में भी कुछ शख्श और कुछ संस्थाएं अमृत की ओर कदम बढ़ा रही थीं। उनके बारे में जानकर मुझे "मृत्योर्मा अमृतम् गमय" मंत्र का अर्थ समझ में आया।
एक शख्स ने भगत सिंह सेवा दल बनाकर सवा चार हजार कोरोना-संक्रमित-शवों का अंतिम संस्कार किया।
आपदा को अवसर समझकर जिन लोगों ने दवा, इंजेक्शन और ऑक्सीजन सिलेंडर की जमाखोरी की तथा येन केन प्रकारेण पैसे बनाए; उन पर सब लोगों ने बहुत जल्दी यकीन कर लिया और निष्कर्ष ले लिया कि मानवता गिर चुकी है।
लेकिन कुछ लोगों के ह्रदय में ऐसे भी भाव पैदा हुए कि उन्होंने आपदा में अमर होने का रास्ता इख्तियार कर लिया और विश्वास दिलाया कि मानवता अभी भी जिंदा है।
जो शख्स कभी घर में बाल्टी तक नहीं उठाते थे,वही शख्स 80 किलो वजन की लकड़ियां उठा-उठा कर एक के बाद एक शव को बिना थके अपने साथियों के साथ अंतिम गति प्रदान कर रहे थे।
दिन हो या रात , देश हो या विदेश जब भी और जहां से भी फोन आया, एक सूचना पर तीन-चार दिनों से पड़ी डेड बॉडी को भी उठा कर कंधा देने से लेकर मुखाग्नि देने तक का इन लोगों ने कार्य किया।
परिजनों के संक्रमित होने पर घर तक नहीं जाना और महीनों एंबुलेंस में ही सोना जैसी तपस्या से गुजर कर इन लोगों की माटी की काया कंचन बन गई।
आखिर इतनी दिव्यता,साहस और शक्ति कहां से आई? - उस शख्स का जवाब था- धर्म ग्रंथों से ;जिन्होंने सिखाया कि इस जीवन में पैसा,पावर कुछ भी काम नहीं आता; सिवाय आपके नेक काम के।
लेकिन नेक दिल उस शख्स को इस दौरान कुछ ऐसे भी अनुभव हुए जो अर्थ को सब कुछ मानने वालों की हृदयहीनता को बेनकाब कर गई। अपने मां- बाप के शवों को संक्रमित होने के डर से हॉस्पिटल आकर नहीं पहचानने वाले लोगों में से किसी ने मरघट आकर अपने पिता के अंतिम दर्शन के नाम पर पीपीई किट खोल कर हीरे की अंगूठी निकाल ली तो किसी ने मां के कानों की बालियां ;तो किसी ने जमीन-जायदाद के कागजात पर मां-बाप के अंगूठे भी लगवा लिए। लगता है ऐसे लोगों ने धर्मग्रंथ की जगह पर कोई अर्थग्रंथ पढ़ रखा था।
भगत सिंह सेवा दल की स्थापना करने वाले उस शख्स श्री जीतेंद्र सिंह शंटी साहब को पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया किंतु इतने बड़े पुरस्कार से भी बड़ा पुरस्कार यह है कि कुछ लोग मंदिर,मस्जिद,गुरुद्वारे और गिरजाघरों में जाकर उनके लिए दुआएं करते रहते हैं-
"वो एक अश्क का कतरा जरूर है लेकिन
मुकाबले में समंदर गुलाम हो जाए।
किसी पर तेज हवाएं असर नहीं करतीं
किसी का सिर्फ दुआओं से काम हो जाए।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे
सेवा-भावना को सलाम🙏🌹