संवाद


"शिक्षा और जागृति"


विद्या विवाद को संवाद में बदलने की कला सिखाती है किंतु दुर्भाग्य से कोई भी वाद समझ के अभाव में


राजनीति के कारण विवाद बनकर रह जाता है और अंतर्-कलह को जन्म दे देता है।


किताब में 'किस महापुरुष को किस रूप में पढ़ाया जाए और कितना पढ़ाया जाए?'इस पर विवाद तो होते ही थे किंतु अब विवाद "हिजाब" पर उतर आया।


नारी-मुक्ति से नारी-सशक्तिकरण तक पहुंचा आंदोलन शिक्षा के कारण आगे बढ़ता हुआ दिख रहा था। किताब पकड़कर लड़कियां अपनी आंखों के हिस्से का ख्वाब सच बना रही थीं-


"कहां सवालों के तुमसे जवाब मांगते हैं?


हम तो आंखों के हिस्से का ख्वाब मांगते हैं।"


पुरुष वर्ग की मानसिकता भी बालिका शिक्षा के प्रति सकारात्मक बन रही थी,तभी तो लड़कियां हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही थीं। लोगों का नजर और नजरिया पढ़ती लड़कियों को देखकर बदल रहा था-


"गुनहगार तो नजरें हैं आपकी वरना


कहां ये फूल से चेहरे नकाब मांगते हैं?"


किंतु आज स्वयं लड़कियां धर्म और परंपरा के नाम पर इसकी मांग कर रही हैं।


पर्दा, घूंघट और नकाब से लंबे संघर्ष के बाद मुक्त होकर लड़कियां एनडीए की परीक्षा में बराबरी का हक मांगने वाली स्थिति में आ गई हैं; उन्हीं लड़कियों को किताब के पहले हिजाब के समर्थन में खड़ा देख रहा हूं तो बड़ा अजीब सा लग रहा है।


किसी की भी आस्था का हम सभी को सम्मान करना चाहिए किंतु प्राथमिकता के निर्धारण के लिए मानसिकता का भी निर्माण करना चाहिए।


पितृसत्तात्मक पुरुष-प्रधान समाज कहीं उन्हें मोहरा तो नहीं बना रहा?


दुनिया में दो प्रकार की प्रमुख दृष्टि हैं- एक विभाजनकारी दृष्टि जो किसी भी वाद को विवाद में बदलकर आगे बढ़ने का रास्ता रोक देती है और दूसरी समन्वयकारी दृष्टि जो किसी विवाद को संवाद की ओर ले जाती है।


भारतीय संस्कृति "विद्या ज्योति: परम्" मंत्र को मानते हुए राजा और राजनीति को भी मार्गदर्शन देने वाले गुरु को सबसे ऊंचा स्थान देती थी।


गुरुकुल गार्गी-याज्ञवल्क्य तथा कृष्ण-सुदामा में कोई अंतर नहीं करता था। नर-नारी,अमीर-गरीब सबके लिए एक समान अन्न और वसन् (वस्त्र) की व्यवस्था शिक्षालयों में होती थी। इसके पीछे मूल उद्देश्य था कि सबका मन एक समान बनाने की पृष्ठभूमि तैयार हो जाए।


"संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्" मंत्र का गुरु - शिष्य सब मिलकर पाठ करते थे,जिसका भाव था- साथ चलें, साथ बोलें और एक समान मन वाला बनें।


शिक्षा के द्वारा जो पवित्र और मुक्त मन बनता था, वही आत्म-दर्शन से आत्मवान् व्यक्तित्व का निर्माण करता था।


तन का जन्म तो मां-बाप से होता है। मन का जन्म थोड़ा-बहुत समाज से और प्रमुख रूप से शिक्षा से होता है। समाज से दिया हुआ मन कोई हिंदू,कोई मुसलमान बन जाता है किंतु सम्यक-शिक्षा से बनाया हुआ मन सिर्फ और सिर्फ इंसान बनता है। इंसान ऊंचाइयां प्राप्त कर महात्मा या भगवान बन जाता है।


तन के स्तर पर रूप,रंग,आकार में स्पष्ट भिन्नता दिखाई देती हैं। मन के स्तर पर भी सबके विचार और सोच थोड़ा-बहुत अलग-अलग हैं। किंतु आत्मा के स्तर पर कोई भिन्नता नहीं दिखाई देती। अतः आत्मोपलब्ध राम,मोहम्मद,नानक और ईशा में कोई विवाद नहीं है किंतु सिर्फ मन के स्तर पर जीने वाले हिंदू, मुसलमान, सिख,ईसाई में विवाद है।


सम्यक्-शिक्षा से वह विवाद आसानी से संवाद में तब्दील हो सकता है। राजनीति बीच में आकर विवाद को हवा दे देती है और तिल का ताड़ बना देती है।


मूल मुद्दा होना चाहिए "सबको गुणवत्तापूर्ण समान शिक्षा मिले। "ड्रेस कोड के नाम पर क्या शिक्षा की बलि चढ़ाई जा सकती है?


अतः मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस श्री मुनीश्वर नाथ भंडारी ने धर्म के नाम पर चलाए जा रहे विभाजनकारी एजेंडे पर नाराजगी जताई है। मंदिर परिसर के अंतर्गत परंपरागत ड्रेस कोड लागू करने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान उन्होंने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि "सबसे महत्वपूर्ण क्या है? देश या धर्म?? यह देखना वाकई चौंकाने वाला है कि "कोई हिजाब के लिए तो कोई अन्य मंदिरों के अंदर धोती के लिए लड़ रहा है। यह देश है या धर्म से विभाजित समुदाय??


'हिजाब विवाद' पर राज्य के पूरे शिक्षण संस्थान को बंद करने का आदेश संकट की स्थिति की ओर संकेत कर रहा है। इसे राष्ट्रव्यापी मुद्दा बनाने का प्रयास तो विकट परिस्थिति पैदा कर देगा।


शिक्षालय पर आक्रमण करना और शिक्षकों को बंधक बनाने की मानसिकता देश के लिए शुभ संकेत नहीं है।


न्यायालय तो मौलिक अधिकार और धार्मिक अधिकार के मुद्दे पर संविधान की मूल भावना के अनुरूप कोई निर्णय देगा। किंतु जब तक शिक्षालय उस मन के निर्माण में सफल नहीं होता जो विविधता में एकता का दर्शन करा देता है, तब तक किसी भी निर्णय को व्यवहार में लाना मुश्किल है।


इसके लिए जरूरी है कि शिक्षालयों का वातावरण पूर्णतया शैक्षिक हो और स्वायत्त हो। एक समग्र उदार शिक्षा और विराट शिक्षक ही भारत के विविधतापूर्ण समाज को राष्ट्रोन्मुख बना सकता है।


लेकिन जब सरकारें वोट- बैंक की खातिर संविधान की मूल भावना से दूर जाने लगें और न्यायालय की अवमानना करने लगें तथा समाज शिक्षालय पर अपने विचार को थोपने लगें तो समस्याएं खड़ी होंगी।


न्यायाधीश पूर्वाग्रह,दुराग्रह और हठाग्रह से मुक्त होकर संविधान की रक्षा करने वाला व्यक्तित्व होता है। उसी प्रकार शिक्षक स्वाध्याय-यज्ञ और ज्ञान-यज्ञ से अपने को तराशकर भावी पीढ़ियों को संवारनेवाला मार्गदर्शक होता है।


यदि न्यायालय और शिक्षालय पर से हमारी आस्था उठ गई तो जीवन अराजक हो जाएगा। आज भी न्यायाधीशों की निष्पक्षता और शिक्षकों की विद्वता के अनुपम उदाहरण हमारे पास हैं, जिन पर विश्वास रखकर नागरिक और समाज को आगे बढ़ना होगा-


"बिखरे हुए पड़े हैं अक्षर,बिखरी हुई पड़ी हैं कड़ियां


बिखरे हुए पड़े हैं मोती, बिखरी हुई पड़ी हैं लड़ियां


इन कड़ियों का,इन लड़ियों का


कुछ भी चयन नहीं कर पाए।


हम अध्ययन नहीं कर पाए


हम अध्ययन नहीं कर पाए।।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹