संवाद


"शिक्षकीय-गरिमा का प्रश्न"


कल समाचारपत्र के मुखपृष्ठ पर एक ऐसे शिक्षक की खबर छपी थी,जिस पर छात्रा ने नंबर देने के बदले अस्मत मांगने का आरोप लगाया था।


आरोप की जांच भी नहीं की गई और प्रमुखता से शिक्षक के फोटो सहित खबर छाप दी गई। शीर्षक दिया गया था- ' शिक्षक की करतूत' और "कहां सुरक्षित हैं बेटियां"।


इसके पहले भी ऐसे आरोपों की खबर प्रमुखता से मुखपृष्ठ पर छापी गई और बाद में जांच में शिक्षक बेदाग निकले।


लेकिन ऐसी खबर के छपते ही शिक्षालय और शिक्षक की गरिमा पर जो दाग लगते हैं, वे दाग कभी छूटते नहीं।


ऐसी घटनाओं में कभी-कभी कुछ सच्चाई भी हो सकती हैं किंतु आरोपों के सिद्ध होने के पहले एक तथ्य को सत्य की तरह प्रस्तुत कर देने पर जीवन के आधार स्तंभ हिल जाते हैं-


"यदि आस्था के सारे आधार गिराओगे,


सर झुकाने को, फिर कहां द्वार पाओगे?"


शिक्षक की गरिमा को गिराने वाले कुछ लोग हैं तो शिक्षक की गरिमा को आकाश की ऊंचाइयों पर पहुंचाने वाले लोग भी हैं।


जिस जमाने में लोग बड़े धन,पद, प्रतिष्ठा की तलाश से विजयी होना चाहते हैं,उसी जमाने में मध्य प्रदेश के पन्ना निवासी विजय चंसौरिया की गाथा अद्भुत है,जो त्याग और दान से सचमुच विजयी हो जाते हैं।


हीरों के लिए प्रसिद्ध पन्ना का असली हीरा तो यह प्राथमिक शिक्षक है,जिसने अपने रिटायरमेंट के अवसर पर जीवन भर की 36 लाख की बचत-राशि गरीब छात्रों की शिक्षा के लिए दान कर दी।


अपनी पत्नी, दो पुत्र और पुत्रवधू को उन्होंने अपने दान के निर्णय के अवसर पर पूछा कि किसी को आपत्ति हो तो बताए। सबने उनके दान के निर्णय का हृदय से समर्थन किया।


धन्य है यह शिक्षक और धन्य है उसके परिवार का संस्कार।


किसान पिता के घर में जन्मे चार भाई,दो बहनों में सबसे बड़े विजय के कंधों पर कम उम्र में ही परिवार की जिम्मेदारी आ गई थी क्योंकि पिता की तबीयत ठीक नहीं चल रही थी। 8 सदस्यीय परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए वे सुबह दूध बेचते और शिक्षालय के बाद हाथ-रिक्शा चलाते। इस कठिन परिस्थिति में भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और एम. ए. करने के बाद परिवहन विभाग में नौकरी पा ली।


परिवहन विभाग की नौकरी से परिवार को तो बड़ी राहत मिली किंतु विजय के दिल को सुकून नहीं मिला। उनके हृदय के अंतः स्थल में बैठे उनके शिक्षकत्व ने आवाज दी और नौकरी छोड़कर वे एक छोटे से स्कूल में प्राथमिक- शिक्षक की नौकरी करने लगे।


38 साल गरीब बच्चों के जीवन संवारने में उन्होंने अपने आप को खपा दिया।_ उनकी सोच थी कि मां,बाप और प्राथमिक-शिक्षक ही बच्चों के चरित्र का निर्माण कर सकते हैं।


वे अपने विद्यार्थियों के लिए किताबें, कपड़े और पर्व के अवसर पर मिठाईयां तक लाते थे जबकि उन्हें अपने विद्यार्थी जीवन में दो वक्त का अच्छा भोजन भी नसीब नहीं हुआ था।


उनकी पढ़ाई में उनके एक मित्र श्री दिनेश सिंह ने काफी मदद पहुंचाई थी। अपने मित्र से प्रभावित होकर अभावग्रस्त बच्चों को हर प्रकार की मदद देकर पढ़ाना उन्होंने अपने जीवन का ध्येय बना लिया।


अच्छे संस्कार और मितव्ययिता से उन्होंने अपने भाई-बहनों की सारी जिम्मेदारियां भी उठाई और अपने पुत्र-पुत्रियों को योग्य भी बनाया तथा सेवानिवृत्ति पर 36लाख रुपए की बचत भी जमा कर ली।


इससे भी ज्यादा परमात्मा का प्रसाद ऐसा बरसा कि उन्हें इतना बड़ा दिल मिला कि जिंदगी भर की कमाई शिक्षा के लिए दान कर दी।


इसी माह स्थानीय जनों ने उनका अभिनंदन भी किया किंतु ऐसे डायमंड-व्यक्तित्व का जीवन और कर्म समाचार-पत्रों के मुखपृष्ठ पर नहीं आया। बस कुछ पारखी नजर वाले की नजर इन पर गई।


कोयले की खदान में छिपे हुए हीरे को पहचानने वाली आंखें दुर्लभ हैं और ऐसे हीरे को कोहिनूर बनाकर जगत के सामने लाने वाली दृष्टि तो दुर्लभतम है।


जरूरत है इस असार दुनिया में सार को ढूंढा जाए -


"क्या कभी तुम जान पाए


जीत क्या है, हार क्या है?


इस जरा सी जिंदगी में


जिंदगी का सार क्या है??"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹