संवाद


"विज्ञान,धर्म और राजनीति"


रूस-यूक्रेन विवाद से उत्पन्न विश्वयुद्ध की आहट के बीच हम 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस वैज्ञानिक सोच विकसित करने और विज्ञान के लाभों के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से मनाएंगे।


किंतु एक तरफ धार्मिक आस्था और वैज्ञानिक सोच के बीच आज टकराव चरम पर है तो दूसरी तरफ यह भी विवाद चरम ऊंचाई पर है कि- "विज्ञान-वरदान या अभिशाप?"।


विज्ञान की शक्ति का राजनीति ने इस प्रकार से दुरुपयोग किया है कि मानवता का धर्म संकट में पड़ गया है।


कैसी स्थिति बन गई है कि एक तरफ बम गिराने वाले जहाज हवा में उड़ते दिखाई दे रहे हैं तो दूसरी तरफ यात्रियों को लाने वाले जहाज के लिए एयरस्पेस बंद है। एक तरफ हजारों भारतीय छात्र-छात्राओं का जीवन संकट में पड़ गया है तो दूसरी तरफ तीसरे विश्वयुद्ध की आशंका चारों तरफ घिर गई है।


जड़ (root cause)में मनुष्य का मन है।


आज राजनीतिक-मन सर्वाधिक प्रभावशाली हो गया है। वह धर्म को भी विवाद का विषय बना देता है और विज्ञान को भी।


इस राजनीतिक-मन को रहस्यदर्शी ओशो ने चित्रित करते हुए कहा कि एक बार परमात्मा विश्वयुद्ध से घबराकर अमेरिका,रूस और ब्रिटेन के पास गया और एक वरदान मांगने को कहा। अमेरिका ने कहा कि हे भगवान! हम तो आस्तिक देश है। हमारी एक ही इच्छा है कि इस धरती पर नास्तिक देश रुस का नामोनिशान ना हो। रूस ने कहा कि यद्यपि हम भगवान को नहीं मानते हैं किंतु यदि धरती से अमेरिका का नामोनिशान मिटा दें तो आपको हम स्वीकार कर लेंगे, बस यही एक वरदान हमें दें। परमात्मा ब्रिटेन के पास गया तो ब्रिटेन ने कहा कि हमें आपसे वरदान में कुछ नहीं मांगना है, केवल अमेरिका और रूस की इच्छा एक साथ पूरी कर दें।


यह छोटी सी कहानी कहती है कि तब से भगवान सोच में पड़ गया है। तब से उसकी आशा उस शिक्षा और शिक्षक की तरफ हैं जो ऐसा मन निर्मित करे जो "सर्वे भवंतु सुखिन:" का वरदान मांगे।


एक तरफ वैज्ञानिक-मन अपनी त्याग, तपस्या और प्रतिभा से परमाणु शक्ति का रहस्य उद्घाटित करता है ताकि विश्व का कल्याण हो। दूसरी तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रूमैन का राजनीति-मन हिरोशिमा पर परमाणु बम गिरा कर मानवता का विनाश कर देता है।


एक तरफ राम,मोहम्मद,ईसा,नानक का धार्मिक-मन प्रेम,करुणा और शांति की स्थापना के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर देता है तो दूसरी तरफ सत्ता और शक्ति के लिए लालायित राजनीतिक-मन उन्हें हिंदू,मुस्लिम,सिख,ईसाई में बांटकर लड़वाता रहता है।


विज्ञान और धर्म जैसे दो सृजनशील क्षेत्र को भी अहंकार केंद्रित राजनीति ने विध्वंसात्मक बना दिया। अन्यथा विज्ञान ने तो पूरे विश्व को एक बना दिया था-सबके लिए एक सिद्धांत, एक पद्धति और हर आविष्कार से सबको लाभ। जिस प्रकार से विज्ञान सभी के लिए एक है, उसी प्रकार से धर्म भी सभी के लिए एक होना चाहिए क्योंकि सभी धर्म की मूल वैज्ञानिक पद्धति एक ही है, सिर्फ उसकी अभिव्यक्तियां अलग-अलग हैं।


जिस प्रकार विज्ञान पदार्थ के बारे में सारी जानकारी देकर हमें शक्ति देता है,उसी प्रकार धर्म परमात्मा के बारे में सारी अनुभूतियां देकर हमें शांति प्रदान करता है। शक्ति और शांति के अद्भुत सम्मिश्रण से पूरा जगत स्वर्ग बन जाता।


किंतु आज शक्ति जिसके पास है, उसका मन बहुत अशांत है। और शांति जिसके पास है,वह किसी हिमालय की गुफाओं में आनंदमग्न है या कमजोर है।


और सामान्य जनता किसी राजनीतिक-मन से उत्पन्न कभी महामारी से तो कभी बमबारी से बहुत दयनीय और दर्दनाक हालत में पहुंच गई हैं-


"हर एक सिम्त है चेहरे पर खौफ का मंजर,


हर एक शख्स सवाली है कल क्या होगा?


दिलो-दिमाग के बीमार हैं जहां देखो,


अब ऐसे में यहां रामराज्य क्या होगा??"


जब भारतीय संस्कृति रामराज्य या राजा जनक की चर्चा करती हैं तो उसका आशय यही है कि किसी गुरु-कृपा से शक्ति और शांति राजनीतिक व्यक्ति में भी हो सकती हैं। फिर राजनीति और राज्य का लोक-कल्याणकारी स्वरूप उभर सकता है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹