आंखें सरकार और परवरदिगार की ओर
February 26, 2022संवाद
"आंखें सरकार और परवरदिगार की ओर"
दहशत की एक रात कितनी लंबी होती है, बिना उससे गुजरे नहीं जाना जा सकता। रुसी हमले के बाद यूक्रेन में बंकरो में छिपे हुए भारतीय स्टूडेंट्स के वीडियो देखकर और उनकी मर्मांतक अपील सुनकर हृदय द्रवित हो गया।
मध्यमवर्गीय परिवार के अधिकतर बच्चे मेडिकल की या अन्य शिक्षा लेने हेतु विदेशों में जाते हैं,जहां की मोटी फीस चुकाने में मां-बाप को अपने खेत-खलिहान तक गिरवी रखने पड़ते हैं। विदेशों में पढ़ने के लिए रहने और आने-जाने का किराया ही इतना ज्यादा होता है कि अधिकतर परिवारों की गाढ़ी कमाई लूट जाती हैं।
उनके लिए तो रूस का यूक्रेन पर आक्रमण उनके रोजगार की संभावना पर ही नहीं बल्कि सीधा जीवन पर ही आक्रमण साबित हो रहा है।
सीमित पैसे और खाने के कम सामान लेकर जान बचाने हेतु सैकड़ों युवा छात्र-छात्राएं बैठकर जागते हुए अपना समय ऐसी जगह पर काट रहे हैं,जहां इतनी बड़ी संख्या के लिए टॉयलेट की समुचित सुविधा तक नहीं है। ऐसे में जब उनके आसपास बम या मिसाइल का धमाका होता है तो उन्हें अपनी मौत की पदचाप सुनाई देने लगती है। और जब यह खबर मिलती है कि युद्ध लंबा खिंच सकता है तो उनकी आंखों के आगे गहरा अंधकार छा जाता है।
उनसे भी ज्यादा बुरी हालत उनके परिवार वालों की हैं। अपने जिगर के टुकड़ों के आसपास प्रतिपल मौत के मंडराते बादल को देखकर उनका रक्तचाप बढ़ जाता है और सांसें थम सी जाती हैं।
इन सारे विद्यार्थियों को स्वयं ही इंतजाम कर बॉर्डर पर पहुंचने के लिए कहा गया है। अब उनकी दुविधा यह है कि हजार किलोमीटर दूर border पर पहुंचने के लिए वाहन का और उसके शुल्क का इंतजाम कैसे करें?
ऐसे में खबर मिल रही है कि बहुत सारे वहां के नागरिक और कुछ विद्यार्थियों का जत्था पैदल ही बॉर्डर की ओर निकल पड़ा है।
यह सुनकर मुझे तो उन मजदूरों की याद आने लगी जो महामारी के समय में खाने का इंतजाम न होने पर पैदल ही घर के लिए रवाना हो गए और रास्ते में असहनीय पीड़ा का सामना करते हुए कुछ काल-कवलित भी हो गए। उस दुख की घड़ी में एक सुखद बात यह हुई थी कि गांव वालों ने रास्ते में उनके खाने-पीने का पूरा इंतजाम कर दिया था। अभी इनके लिए तो सुनसान रास्ते पर ऐसा कोई भी सहारा नहीं मिलेगा और रास्ते में किसी दुर्घटना के घटित होने का अंदेशा भी पूरा-पूरा है।
बंकरो में बंद रहने पर भूखे मरने का डर और रास्ते में निकलने पर बमबारी का डर में से उन्हें एक चुनना था तो उन्होंने निकलने का चुनाव कर लिया।
किसी तानाशाह के लिए एक जमीन के टुकड़े पर कब्जे का प्रश्न है और आम इंसान के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। तानाशाह अपने महल में से लड़ाकू जहाज भेजने का और मिसाइल छोड़ने का एक आदेश देता है और आम इंसान का जीवन भर का सारा अरमान क्षण भर में धुआं बनकर आकाश में उड़ जाता है।
हमारी तथाकथित विकसित सभ्यता इस मुकाम तक पहुंची है कि जिस एक मकान को बनाने में आम इंसान को बरसों लग जाते हैं, उसे ढहाने में उसे क्षण भर भी नहीं लगता।
प्राचीनकालीन युद्ध में एक दूसरे पर भाला फेंकने पर या बाण मारने पर जो लहू की धारा फूटती थी, उसे देख कर मारने वाले का भी हृदय स्वयं को निष्ठुर ठहराता था, अब अर्वाचीन-युद्ध में खून का तो सवाल ही नहीं, शव जलाने के बाद जो राख में हड्डियां बचती हैं, वह भी नहीं मिलती।
ऐसे कठिन समय में हम भारतीयों के लिए एक ही चारा है कि अपनी सरकारों से यह निवेदन करें कि बिना देर किए उन हजारों परिवारों के आंसुओं को जल्द से जल्द रोकने का प्रयास किया जाए। और दूसरा तथा अंतिम चारा परमात्मा से प्रार्थना का है कि सबको सद्बुद्धि दे ताकि जल्द से जल्द शांति स्थापित हो सके।
साहिर लुधियानवी साहब की ये पंक्तियां बहुत ही विचारणीय और अनुकरणीय हैं-
बम घरों पर गिरे की सरहद पर
रुहे तामीर जख्म खाती है,
खेत अपने जलें या औरों के
ज़ीस्त फाकों से तिलमिलाती है।
टैंक आगे बढ़े या पीछे हटे,
कोख धरती की बांझ होती है
फतेह का जश्न हो या हार का शोक,
जिंदगी मय्यतों पे रोती हैं।
जंग तो खुद ही एक मसला है,
जंग क्या मसअलों का हल देगी
खून और आग आज बरसेगी,
भूख और एहतियाज कल देगी।
इसलिए ए शरीफ इंसानों!
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आंगन में
शम्मा जलती रहे तो बेहतर है।।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹