संवाद


प्रश्न- "चारों तरफ से तनाव से घिरे होने के कारण पढ़ाई में मन नहीं लगता, इससे कैसे बाहर निकलें?" -- नेहा चारण


प्रिय विद्यार्थी!


मानव-जीवन एक बेचैनी है क्योंकि इंसान ऊंचाई की ओर बढ़े तो भगवान बन सकता है और नीचाई की ओर गिरे तो शैतान भी बन सकता है। इन दोनों में से किसी एक का चुनाव करने के लिए हमें स्वतंत्रता है, अतः मनुष्य तनाव से मुक्त नहीं हो सकता।


यह तनाव वैसा ही है जैसे गाड़ी में ब्रेक होता है। यदि ब्रेक नहीं हो तो गाड़ी रुक नहीं सकती। किंतु इसके साथ गाड़ी में एक्सीलरेटर भी होता है, जिससे गाड़ी गति पकड़ती है। एक ही पैर जरूरत के अनुसार कभी ब्रेक पर रखा जाता है तो कभी एक्सीलरेटर पर।


हम चाहे तो तनाव का सकारात्मक उपयोग कर सकते हैं। मन के अंदर कई प्रकार की इच्छाएं होती हैं,जो ध्यान भटकाती हैं।


किंतु मन के पास संकल्प-शक्ति भी होती है जो एक्सीलरेटर का काम करती है।


संकल्प का जन्म साधना से होता है। विद्यार्थी जीवन साधना का जीवन होता है। इसी कारण कहा गया है- "विद्यार्थिन: कुतो सुखम् " अर्थात् विद्यार्थी को सुख कहां?


अधिकतर विद्यार्थियों के जीवन में आज तनाव का मुख्य कारण यह है कि वे घूमने-फिरने, खाने-पीने और मोबाइल पर गेम खेलने जैसी सारी इच्छाओं के साथ पढ़ने की इच्छा की भी पूर्ति करना चाहते हैं। समय और शक्ति सीमित हैं। इसे या तो पढ़ाने में लगा लो या अन्य कामों में।


प्राचीन काल में गुरु के आश्रम में सादगीपूर्ण और तपस्यापूर्ण जीवन जीने के लिए विद्यार्थी को भेज दिया जाता था। वहां पढ़ाई-लिखाई से ध्यान भटकाने वाला न तो सामान होता था और न समाज होता था।


आज के विद्यार्थियों के समक्ष ध्यान भटकाने वाली अनेक चीजें हैं, जिसके कारण विद्यार्थी तनाव में हैं-


"यह मेरा कामातुर जीवन कहां-कहां भटकेगा जाने?


पानी में बहते प्रसून सा कहां-कहां अटकेगा जाने??"


आज के विद्यार्थी की एक इच्छा पूरब की ओर खींच रही है तो दूसरी इच्छा पश्चिम की ओर। अब इसमें तनाव नहीं होगा तो क्या होगा?


ऐसे में शिक्षक की और शिक्षालय की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। शिक्षक का पूरा जीवन पढ़ने-पढ़ाने में लगा रहता है तो विद्यार्थी को उसके जीवन से और शब्दों से स्वाध्याय के लिए अपनी संकल्प-शक्ति जगाने हेतु प्रेरणा मिल जाती है।


विद्यार्थी के पास प्यास हो तो वह शिक्षक भी ढूंढ लेता है और हर जगह उसके लिए शिक्षालय बन जाता है। एकलव्य से बड़ा उदाहरण इस बात का और क्या होगा।


विवेकानंद कहा करते थे कि समस्त शक्तियों को किसी एक बिंदु पर एकाग्र करो तो कोई भी रहस्य खुल जाता है।


जब विद्यार्थी की आंखें कई दिशाओं में भटक रही हों तो ऐसी स्थिति का नाम तनाव है। जब सिर्फ मछली की आंख दिखाई दे तो इसी का नाम ध्यान है-


तुमने देखा दाएं बाएं, तुमने ऊपर नीचे देखा


आंखें फाड़ निहारा तुमने, तुमने आंखें मींचे देखा।


किंतु किसी भी ओर, कभी भी,


स्थिर नयन नहीं कर पाए


तुम अध्ययन नहीं कर पाए,


तुम अध्ययन नहीं कर पाए।


चुनाव तुम्हारे हाथ में है कि अनेक इच्छाओं के साथ इधर-उधर बहना चाहते हो या संकल्प-शक्ति जगाकर मंजिल को प्राप्त करना चाहते हो। इधर-उधर भागोगे तो तनाव होगा और मंजिल की ओर बढ़ोगे तो शांति मिलेगी।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹