श्रद्धांजलि


"अहंकार पर अरमान की बलि"


भारतीय छात्र "नवीन शेखरप्पा" रूस-यूक्रेन युद्ध की बलि चढ़ गए। चंद्रशेखर(शिव) के दर्शन हेतु महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर मंदिर जाने के लिए उत्साहित मेरा मन टूट गया।


यह समाचार सुनकर क्या हालत हो रही होगी,उन हजारों भारतीय छात्र-छात्राओं की जो भूखे-प्यासे सुरक्षित निकल जाने की चाह में पल-पल जीवन से संघर्ष कर रहे हैं? उन लाखों परिजनों का मन किस पीड़ा से गुजर रहा होगा जो इन हजारों छात्रों से जुड़े हुए हैं?


दोनों देश युद्ध में मरने वाले की संख्या मात्र गिना रहे हैं। किंतु एक इंसान गणित का एक संख्या मात्र नहीं होता। एक शेखरप्पा किसी का बेटा था,तो किसी का भाई भी, किसी का भतीजा था तो किसी का भगीना भी, किसी का पोता था तो किसी का नाती भी, किसी का पड़ोसी था तो किसी का दोस्त भी, किसी देश का नागरिक था तो बहुतों का रिश्तेदार भी, किसी का सीनियर था तो किसी का जूनियर भी..... इतने रिश्तों और संबंधों को यह हादसा सूना कर गया।


"अहंकार पर कितने अरमानों की बलि चढ़ेगी?" -यह सोचने का यह सही वक्त है।


क्या नागरिकों का और सामान्य जनता का युद्ध के निर्णय में कोई हाथ नहीं होता? यदि नहीं होता है तो सबसे ज्यादा पीड़ित नागरिक और जनता ही क्यों होती हैं?


युद्धरत राष्ट्रपतियों में से किसी का पुत्र यदि बलि चढ़ जाए तो क्या वे उसी हाव-भाव के साथ राष्ट्र को या किसी सभा को संबोधन करने की स्थिति में होंगे, जिस उत्साह और विश्वास के साथ वे अभी कर रहे हैं?


सवाल सत्ताधीशों की संवेदना का है।


महात्मा बुद्ध रोहिणी नदी के दोनों तरफ शाक्य और _कोलिय_जनपद की सेनाओं को युद्ध के लिए खड़े देखकर बीच में पहुंच गए। उस समय के राजाओं के दिल में संन्यासियों का और गुरुओं का बड़ा आदर था। दोनों राजा ने उन्हें प्रणाम किया।


बुद्ध ने पूछा कि- "युद्ध का कारण क्या है?" राजाओं ने एक साथ उत्तर दिया- रोहिणी नदी का पानी।


महात्मा ने कहा कि जल तो जीवन देता है,जीवन लेता नहीं है। रोहिणी नदी का पानी अभी तक दोनों राज्यों को धन-धान्य से संपन्न बना रही थी।


अचानक क्या हुआ? हे राजन! तुम दोनों सही कारण बताओ। दोनों राजा सोचने पर विवश हो गए तो पता चला कि गर्मी के दिन के कारण नदी में पानी कम हो जाने पर पहले पानी कौन लेगा, इस बात को लेकर दोनों के अहंकार टकरा गए थे।


महात्मा बुद्ध ने कहा कि युद्ध का कारण अहंकार हैं और राजाओं के अहंकार पर इतने लोगों की बलि चढ़ाया जाना क्या उचित है?


कहानी कहती है कि महात्मा बुद्ध के प्रभाव से दोनों राजा के द्वारा अहंकार छोड़ते ही युद्ध टल गया और वहां की जनता रोहिणी नदी के पानी का आवश्यकतानुसार उपयोग करती रही। फिर युद्ध की नौबत ही नहीं आई।


आज का दुर्भाग्य यह है कि राजाओं और बुद्धों में कोई संबंध नहीं है। शक्ति के अहंकार की यह विशेष बात है कि उसके पास विध्वंस के सिवाय और कुछ नहीं होता। जब तक शक्ति के साथ शिव का मिलन नहीं होता सृजन संभव नहीं।


शिव तो विष का भी सदुपयोग कर लिए और राहु अमृत पाकर भी काटा गया। कहीं विज्ञान की शक्ति हमारा विनाश न कर दे!


अतः यह वक्त विश्व के सभी नागरिकों के लिए परमात्मा से प्रार्थना का और अपनी एकजुटता प्रदर्शित कर शांति स्थापना हेतु आवाज उठाने का वक्त है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे


अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि🙏🌹