सत्यम्-शिवम्-सुंदरम्
March 1, 2022संवाद
"सत्यम्-शिवम्-सुंदरम्"
असत्य,अशिव और असुंदर दुनिया में सत्यम्-शिवम्-सुंदरम् की खोज मानव की सबसे बड़ी अभीप्सा है। ऐसी अभीप्सा पशुओं में नहीं होती क्योंकि पशु आजीवन पशु ही बने रहते हैं। किंतु इंसान की शैतान या भगवान बनने की संभावना सदा विद्यमान रहती है। इसीलिए दस्यु बाल्या भील मन के परिवर्तित होते ही ऋषि बाल्मीकि बन जाता है।
भौतिकतावादी मन को अध्यात्मवादी मन की ओर ले जाने वाले सूत्र का नाम सत्यम्-शिवम्-सुंदरम् है।
सत्य बड़ा विराट है-इसमें जीवन भी है और मृत्यु भी है, सफलता भी है और असफलता भी है, आशा भी है और निराशा भी है, मिलन भी है और वियोग भी है, अमृत भी है और विष भी है।
सामान्यतः मानव और देव को अमृत तो स्वीकार होता है किंतु विष नहीं। किंतु शिव विष को पीकर देव से महादेव बन गए।
जब अर्जुन को भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अपना विराट स्वरूप दिखाया तो अर्जुन निवेदन करने लगा कि हे भगवान्! आप अपना सौम्य और कल्याणकारी स्वरूप ही दिखाइए।
हम विराट सत्य को पचा नहीं पाते हैं।इसलिए ऐसे सत्य की कामना करते हैं जो शिव भी हो।
शिव को भी समग्रता में स्वीकार कर पाना सामान्य मानव के लिए बहुत मुश्किल है। क्योंकि लोग श्रेय के पीछे नहीं, प्रेय के पीछे भागते हैं। अतः शिव के उसी भाग को अपनाते हैं जो हमें सुंदर भी लगता हो।
इसीलिए सत्यम् , शिवम् के साथ सुंदरम् भी जोड़ दिया जाता है।
शिव एक तरफ मृत्यु के देवता हैं जिसके कारण उनको महाकाल कहा जाता है तो दूसरी तरफ हम शिवलिंग की पूजा करते हैं जो कि जन्म का सूचक है। अर्थात् कल्याण (शिव)को भी सम्पूर्णता से न अपना सकने की क्षमता के कारण हमने सुंदरम् को जोड़कर सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय बना दिया।
शिव के साथ शक्ति के मिलन की रात्रि अर्थात् महाशिवरात्रि सत्यम्-शिवम्-सुंदरम् की रात्रि है।
कितनी अद्भुत है भारतीय संस्कृति जिसमें शक्ति को स्त्री- स्वरूपा माना गया है और शिव को पुरुष-स्वरूप। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं-
"ऐसा कोई गीत नहीं है
जिसमें तेरा राग नहीं हो।
ऐसी कोई प्रीत नहीं है
जिसमें तेरा त्याग नहीं हो।।"
साधन और सुविधा के अभाव होने के बावजूद भवानी शंकर का समृद्ध व संपन्न दांपत्य-जीवन सत्य भी है और शिव भी तथा सुंदर भी। अतः बाबा तुलसीदास रामचरितमानस में लिखते हैं-
"भवानी शंकरौ वंदे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ
याभ्यां बिना न पश्यंति सिद्धा: स्वांत:स्थमीश्वरम्।"
अर्थात् श्रद्धा रूपी भवानी और विश्वास रूपी शंकर की वंदना करता हूं, जिनके बिना अंत:स्थित ईश्वर को सिद्ध लोग भी नहीं देख पाते।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे
महाशिवरात्रि की शुभकामना🙏🌹