गंगा को प्यासे तक पहुंचाएं भागीरथ
March 4, 2022संवाद
"गंगा को प्यासे तक पहुंचाएं भागीरथ"
ऑपरेशन गंगा के तहत बहुत सारे विद्यार्थियों को यूक्रेन से भारत सकुशल लाया गया, यह हर्ष की बात है और अपनी सरकार के प्रति आभार जताने का मौका भी हैं किंतु मेरा मन अभी भी फंसे उन हजारों विद्यार्थियों पर अटक गया है, जिनके सब्र का बांध टूटता जा रहा है और उनके परिजनों के आंख के आंसू थम नहीं रहे हैं। लगातार हो रही बमबारी के बीच लाइन काट दिए जाने से घनघोर अंधेरे में वे छात्र-छात्राएं अपनी जान बचाने की गुहार लगा रहे हैं। उनके पास खाने का ही नहीं, पीने के पानी की भी कमी हो गई है। ऐसी स्थिति में संपर्क सूत्रों से बात करने का प्रयास करने पर भी उन्हें कोई सहारा मिलता नहीं दिख रहा है।
अत्यधिक ठंड में गलते जा रहे ये विद्यार्थी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए एक बहुत ही मुश्किल दौर में पहुंच चुके हैं। उन्हें अपने रिस्क पर नियत स्थान तक पहुंचने को कहा जा रहा है। किंतु उनके पास न तो पैसे हैं और न अब आगे बढ़ने की शक्ति बची है।
इस प्रतिकूल परिस्थिति में भी जो बाहर निकले, उनमें से 1/2 को गोली लग जाने से सभी दहशत में आ गए हैं। यूक्रेनवासियों का उनके प्रति उदासीन या कठोर व्यवहार उनकी मुश्किलें कई गुना बढ़ा दे रहा है।
ऐसे में संवेदनशील सरकार से आग्रह है कि वे भागीरथ बनकर गंगा को प्यासे तक पहुंचाएं। इस नाजुक परिस्थिति में जल्द से जल्द उठाया गया छोटा कदम भी इतिहास में बहुत बड़े कदम के रूप में दर्ज किया जाता है।
भारत विश्व की सबसे बड़ी उभरती अर्थव्यवस्था है, हमारे प्रधानमंत्री की गणना विश्व के शीर्ष नेताओं में होती है और रुस भारत का चिर परिचित मित्र है; फिर हमारे हजारों नौजवानों को इस घनघोर संकट से निकालने में क्या दिक्कत है, मेरी समझ में नहीं आ रहा।किसी कवि के शब्दों में-
यहां गंगा, यहां जमुना, यही संगम मगर फिर भी
बहुत पीछे इलाहाबाद क्यों है,सोचना होगा?
वो ज्ञानी है मगर नाशाद क्यूं हैं,सोचना होगा,
वफा की राह में बर्बाद क्यों है, सोचना होगा??
समस्त शिक्षार्थी और शिक्षालयों का भी यह दायित्व बनता है कि मुश्किल में घिरे इन विद्यार्थियों के लिए प्रार्थना करें और इनकी आवाज को दूर-दूर तक पहुंचाएं।
जब जान लेने वाले अपने असत्-संकल्प के लिए दिन-रात एक कर सकते हैं तो जान बचाने वाले अपने सत्-संकल्प के लिए अपनी सरकार से गुहार और परमात्मा से पुकार जोरदार ढंग से क्यों नहीं कर सकते?-
सूखते जब जिंदगी के स्रोत सारे
धार से कटते चले जाते किनारे
कौन दृढ़ विश्वास इन कठिनाइयों में
जिंदगी को हर सुबह हर शाम देता।
जब निगाहों में सिमट जाते अंधेरे
जिंदगी बिखरे समय के खा थपेड़े
कौन फिर संजोग बन तन्हाइयों में
जिंदगी को नित नए आयाम देता।।
संकट से घिरे इन भारतीय भाई-बहनों के लिए अपनी-अपनी छोटी-छोटी भूमिका को निर्धारित करने का वक्त है। समवेत संकल्प और प्रार्थना में बहुत बड़ी शक्ति होती है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹