होली:शक्ति के विरुद्ध भक्ति की जीत का पर्व
March 16, 2022संवाद
"होली:शक्ति के विरुद्ध भक्ति की जीत का पर्व"
होलिका की आग में सोना और निखर जाता है जबकि कोयला जलकर राख हो जाता है। हिरण्यकश्यप नास्तिकता का और अहंकार का प्रतीक है और उसकी बहन सिंहिका _विध्वंस_की आग का। आज पूरा विश्व अहंकारजनित विध्वंस की आग में जल रहा है।
प्रहलाद प्रतीक है आस्तिकता का और सृजन का। आस्तिकता बालक के समान निर्दोष और कोमल होती है किंतु उसका भरोसा परमपिता में इतना अटूट होता है कि हर अग्निपरीक्षा से वह और निखरता चला जाता है और जीवन की सृजनशीलता को बढ़ाता चला जाता है।
करोड़ों लोगों की जिंदगी तबाह हो गई और लाखों लोग अपना घर बार छोड़कर रूस-यूक्रेन युद्ध की आग से बचने के लिए पलायन कर गए। इसमें छोटे से लेकर बड़े तक आंखों में आंसू भरे हुए आकाश की ओर प्रार्थना की भाव दशा में टकटकी लगाए हुए नई अनजानी दुनिया के सृजन की ओर कदम बढ़ा दिए।
ऊंचे नीचे रास्ते और मंजिल बड़ी दूर की परिस्थिति के बीच रक्षा का अज्ञात भरोसा उनके कदमों को आगे बढ़ने की शक्ति दे रहा है। विष्णु की तरह रक्षक व पालक के रूप में कई देशों की दिव्य-आत्माएं अपनी बाहें फैलाकर और अपने दिल के दरवाजे खोल कर उन्हें मानवता का भरोसा दिला रही हैं।
आबाद होने में बरसों लग गए शहरों को खंडहरों में तब्दील करने में आग बरसाने वाले बमों को लम्हे भी नहीं लगते। पेड़-पौधों से लेकर पशु-पंछी तक, नर-नारी से लेकर बाल-वृद्ध तक जिन इलाकों में प्रेम के तराने गाते थे,उन इलाकों में नफरत का धुआं चारों तरफ उठता दिखाई दे रहा है।
ऐसे में जब हम सब भारतवासी होलिका दहन करने और एक दूसरे को रंगों में रंगने की तैयारी कर रहे हैं तो इतना अवश्य ध्यान रखें कि कहीं हम हरी शाखाओं की टहनियों को जलाकर अनजाने में सिंहिका को ही तो नहीं बढ़ा रहे हैं।
और प्रेम के प्राकृतिक रंग की जगह नफरत के कृत्रिम रंगों का प्रयोग करके दिलों को जोड़ने की जगह तोड़ने के रास्ते पर तो नहीं बढ़ रहे हैं।
जिस प्रकार प्रिज्म से गुजरने पर सफेद रंग सात रंगों में प्रकट होता है उसी प्रकार प्रेम से गुजरने पर यह संसार रंगीन हो जाता है।
परमात्मा ने इतनी रंग-बिरंगी और खूबसूरत प्रकृति बनाई कि इन आंखों को विश्वास नहीं होता किंतु होली का पर्व उस विश्वास को एक उत्सव का आधार देता है क्योंकि इस दिन प्रेम के अतिरेक के कारण हर कोई हर रंग में रंगने को बेताब हो जाता है।
मनुष्य की तो बात ही छोड़िए पशु-पंक्षियों से लेकर पेड़- पौधों तक में भगवान का दर्शन करने वाली संस्कृति का अद्भुत पर्व होली विविधता से पूर्ण प्रकृति और परमात्मा के प्रति आभार का त्यौहार है-
एक रंग मांगा था तुमने सुरधनु का उपहार दे दिया
एक रूप मांगा था तुमने यह सारा संसार दे दिया।
परमात्मा ने प्रकृति में इतने प्रकार के रंग और रूप हमें समृद्ध बनाने के लिए दिए किंतु हम उन्हें सियासी दृष्टिकोण के कारण बांटकर गरीब बन जाते हैं-
"लाल,भगवा,हरा,नीला भी गर सियासी हो जाएगा
तो रंगीन दुनिया बनाने को नया रंग कहां से आएगा?"
वैश्विक-महामारी से लेकर वैश्विक-युद्ध जहां बहुत बड़े विध्वंस की पृष्ठभूमि बना रहा है, वहां पर हमारा होली उत्सव प्रेम के द्वारा सृजन के बीज को अंकुरित कर पल्लवित-पुष्पित कर सके तो नास्तिकता के विरुद्ध आस्तिकता का और विध्वंस के विरुद्ध सृजन का बहुत बड़ा पैगाम विश्व को जाएगा। और बे-रंग जीवन अनेक रंगों से भर जाएगा।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे
होली की शुभकामना🙏🌹