खुश देशों में भारत पिछड़ा क्यों?
March 20, 2022संवाद
"खुश देशों में भारत पिछड़ा क्यों?"
अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस इस मायने में महत्वपूर्ण है कि यह एक पैमाना देता है कि जीवन का आकलन हैप्पीनेस के आधार पर किया जाए न कि इनकम के आधार पर। सर्वे में पाया गया कि जिन देशों की राष्ट्रीय आय ज्यादा है, उन देशों का स्थान हैप्पीनेस-इंडेक्स में उतना ऊंचा नहीं है। इंटरनेशनल हैप्पीनेस इंडेक्स में फिनलैंड,आइसलैंड,हालैंड जैसे वे राष्ट्र अव्वल नंबर पर हैं जिन्होंने संपत्ति से ज्यादा महत्व परस्पर-सौहार्द और सहयोग को दिया है।
भूटान जैसे छोटे देश में ग्रॉस डॉमेस्टिक प्रोडक्ट (जीडीपी) की जगह ग्रॉस हैप्पीनेस प्रोडक्ट (जीएनपी)को अपनाया गयाऔर सभी मंत्रालयों को असमानता कम करने एवं लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए प्रेरित किया गया। भौतिकवादी लक्ष्यों की अपेक्षा आध्यात्मिक और नैतिक लक्ष्यों को ज्यादा महत्व दिया गया। कम से कम संसाधन में ज्यादा से ज्यादा खुशी प्राप्त करने की कला को विकसित किया गया।
चूंकि हमारा भारत 139 राष्ट्रों की सूची में पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी पीछे 136वें नंबर पर हैं, अतः एक विचारणीय विषय बनता है कि प्रेम और त्याग जैसे दुर्लभ गुणों के कारण "सर्वे भवन्तु सुखिन:" की कामना करने वाला विश्व गुरु भारत खुशी के इंडेक्स में पिछड़ा क्यूं है? झोपड़ी में भी महलों से ज्यादा खुश रहने की कला जानने वाला भारत आज विश्व की सबसे बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला देश होने के बावजूद सबसे ज्यादा खुश देशों में क्यों नहीं है?
जबकि "शांत रहो, समझदार रहो,दयालु रहो" 2022 की थीम भारत की साहित्यिक,सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का मूलमंत्र रहा है।
होली पर्व के अवसर पर जब मैंने अपने बचपन, किशोरावस्था और प्रौढ़ावस्था के होली मनाने के तौर तरीकों पर गौर किया तो पाया कि परस्पर मेल-मिलाप की जगह पर शनै:शनै: व्यक्तिगत जीवन प्रमुख होता गया और हृदय से जीने की अपेक्षा हम बुद्धि से ज्यादा जीने लगे।
बचपन संयुक्त परिवार में बीता जहां पर इतने लोग रहते थे कि होली के अवसर पर पैर छूकर आशीर्वाद लेने में और गले लग कर प्रेम जताने में कई घंटे लग जाते थे। सुबह का सूरज कब सर के ऊपर आ जाता था, यह पता ही नहीं चलता था। सैकड़ों लोगों के तन पर रंग-गुलाल लगाने के बाद भी मन नहीं भरता था। रंग की अपनी दो पुड़िया और छोटी सी थैली का गुलाल खत्म हो भी जाता था तब भी होली खेलना खत्म नहीं होता था क्योंकि जो रंग लगाने आता उसके ही रंगों से उसे भी रंग दिया करते थे।
किशोरावस्था में घर से 50 किलोमीटर दूर शहर में जब पढ़ने आया तो चचेरे भाई-बहन तो साथ रहते ही थे, अगल-बगल पड़ोस में गांव के लोग भी मिल जाते थे और साथ ही शहर के नए दोस्तों का संग होली में नया रंग भर देता था।
किंतु घर से दूर प्रदेश में नौकरी में आने के बाद पैसा,पद, प्रतिष्ठा सब मिल गया हैं किंतु अपने और वो अपनापन का भाव कहीं दूर चले गए हैं। रंग ही नहीं व्यवहार में भी कृत्रिमता आ गई है। हृदय की वो उमंग और जिंदगी की वो तरंग न जाने कहां गायब हो गई।
आज हिंदू हरा रंग से परहेज करने लगा और मुसलमान भगवा रंग से, किसी को लाल रंग में परंपरा का विरोध दिखाई देता है तो किसी को नीले रंग में उच्च-वर्ण का तिरस्कार।
इस लोकतंत्र में पार्टी का रंग ऐसा चढ़ गया है कि बिना पूछे किसी को किसी भी रंग में रंग देना खतरे से खाली नहीं रहा।
"जीवन में कोई रंग तभी मिल सकता है
पिंजड़े के बाहर जब तू निकल सकता है।"
परमात्मा ने तो प्रकृति में इसीलिए इतनी विविधता भरी कि हमारे जीवन में कोई कमी न रह जाए। किंतु हमने उस विविधता को पृथकता में बदलने की राजनीति शुरू कर दी। अब तो आपके विचार ही नहीं आपके कपड़े और गाड़ी का कलर भी अंदाज़ लगाने के लिए काफी है कि आप किससे जुड़े हुए हैं।
किंतु मैं सामने में देख रहा हूं कि बच्चे आज भी बाल्टी में कई रंगों को मिलाकर उसे अपनी पिचकारी में भरकर बिना पूछे किसी को भी भिंगो देते हैं और चिल्लाते हैं कि बुरा न मानो होली है। उनको तो अपने हृदय के उमड़ते हुए प्रेम को बांटना है और बरसाना है। जाति,धर्म,लिंग,भाषा की चिंता बच्चे नहीं करते,उनकी तो चिंता बस इतनी है कि आप बिना रंगे न रह जाएं। उनके मन में इतना रंग भरा हुआ है कि यदि आदमी मिलना बंद हो जाए तो वे पशुओं को भी रंगने लगते हैं और पशु भी न मिले तो दीवारों को रंगने लगते हैं।
हम बड़े ऐसी नादानियां करना भूल गए। किंतु जरा सोचें कि हमारी बुद्धिमानी बच्चों की नादानियों के सामने कहां पर टिकती हैं?
काश! वो नादानियां भगवान सारी बुद्धिमानियों को लेकर फिर से दे देता तो हर घर अपना घर दिखाई देता और हर रंग में स्व को तथा पर को भिंगो देने का अरमान मचलता-
"जब स्व और पर का भेद खोने लगता है
तब कोई रंग तन मन भिंगोने लगता है।।"
जिंदगी में खुशी पाने का मंत्र तो इन बच्चों के पास हैं। काश! सभी बड़े भी सारे लेवल हटाकर अपनी बुद्धिमानी को गौणकर हृदय में जीने की कला सीख जाएं तो भारत इंटरनेशनल हैप्पीनेस इंडेक्स में पिछले स्थान से अगले स्थान पर आ जाए।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹