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आजादी के अमृत महोत्सव के शुभ अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में भाषण की शुरुआत में युवा पीढ़ी से मैं एक प्रश्न कर बैठा- "आजादी के अमृत महोत्सव में आपको क्या-क्या अमृत मिला है या किस अमृत का अनुभव हो रहा है?"


सभी ने एक स्वर में जवाब दिया कि "हमें विष का अनुभव हो रहा है।"


इस उत्तर की कल्पना भी मैंने नहीं की थी। मुझे तो उन्हें यह बताने के लिए बुलाया गया था कि क्या-क्या अमृत मिला है और मिल रहा है।


शुरू में ही मैं क्लीन-बोल्ड हो गया फिर भी पिच पर डटा रहा। उन्हें यह बताता रहा कि भारत ने 75 वर्षों में क्या-क्या अमृत पाया है?


लेकिन गरीबी,बेरोजगारी,भ्रष्टाचार और भेदभाव का गरल पी रहे एक युवा ने व्यक्तिगत रूप से मुझे बताया कि-मेरी शादी की उम्र निकली जा रही है, जो भी परीक्षा दी वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया, घर में बूढ़े मां-बाप की देखभाल करनी है और दो बहनों की शादी के बारे में सोचना है; अब आप बताएं कि गुलामी का गरल पी रहे व्यक्ति से आप आजादी के अमृत का स्वाद क्यों और कैसे जानना चाह रहे हैं?


युवा पीढ़ी की वस्तुस्थिति जानकर अपने दिए गए भाषण के लिए मैं अपराध-बोध से भर गया और दुष्यंत साहब की दो पंक्तियां बार-बार आंखों के सामने नाचने लगीं -


"आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख


घर अंधेरा देख तू,आकाश के तारे न देख।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹