एक डॉक्टर की आत्महत्या से उठे सवाल
April 2, 2022संवाद
"एक डॉक्टर की आत्महत्या से उठे सवाल"
नव संवत्सर और चैत्र नवरात्रि की शुभकामना देते हुए नई चुनौतियों के समक्ष भारतीय चिंतन-परंपरा की चिर नवीन दृष्टि को सबके समक्ष विचारार्थ रखने की इच्छा हो रही है।
जान बचाने वाले डॉक्टर और जीवन देने वाले शिक्षक के प्रति भारतीय संस्कृति की दृष्टि अनूठी रही है। भारतीय संस्कृति कहती है कि अपने वैद्य और गुरु से कुछ भी छुपाना नहीं चाहिए और वैद्य तथा गुरु को भी कल्याण की बात बिना भय और संकोच के कहनी चाहिए; क्योंकि-
डॉक्टर,शिक्षक न पद है, न पेशा है और न व्यवसाय है
और न ही गृहस्थी चलाने वाली कोई आय है।
यह सभी धर्मों से ऊंचा धर्म है
गीता में उपदेशित मा फलेषु वाला कर्म है।।
डॉक्टर और शिक्षक होना तो कर्म के साथ धर्म भी है जो किसी की जान बचाने के लिए और किसी का जीवन बदलने के लिए स्वयं को दांव पर लगा देते हैं।
अतः डॉक्टर अर्चना के सुसाइड नोट ने सभी संवेदनशील-हृदयों को बहुत विचलित कर दिया।
यूथेनेसिया का आंदोलन पश्चिमी जगत में चल रहा है जिसमें गंभीर बीमारी से ग्रस्त होने पर या ज्यादा वृद्ध होने पर स्वेच्छा से मरने के अधिकार की मांग की जा रही है। किंतु डॉक्टरों का मानना है कि किसी भी स्थिति में मरने के अधिकार का हम समर्थन नहीं कर सकते क्योंकि हिपोक्रीत्ज शपथ के अनुसार किसी भी कीमत पर जान बचाना हमारी प्राथमिकता है।
कोरोना महामारी के दौरान जितनी असह्य पीड़ा को झेल कर प्रतिकूल परिस्थितियों में डॉक्टर्स ने अपनी जान न्योछावर कर के भी जो सेवा दी है, उससे उऋण नहीं हुआ जा सकता।
ऐसी परिस्थिति में एक गोल्ड मेडलिस्ट डॉक्टर द्वारा अपने सुसाइड नोट में यह लिखना कि- "मैंने कोई गलती नहीं की।मेरा मरना शायद मेरी बेगुनाही साबित कर दे.... " कुछ यक्ष-प्रश्न समाज के सामने खड़े करता है।
किसी भी सीरियस पेशेंट को यदि डॉक्टर हिंसा के डर से देखने से मना करने लगे तो उसे लेकर अब हम कहां जाएंगे? क्योंकि कोई भी डॉक्टर अब सौ बार सोचेगा कि गंभीर बीमारी वाले मरीज की जान जाने पर परिजनों द्वारा कुछ भी किया जा सकता है।
जिस प्रकार श्रद्धा के बिना गुरु से ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते,उसी प्रकार विश्वास के बिना डॉक्टर से इलाज नहीं प्राप्त कर सकते। इसी कारण से इन्हें भगवान का रूप कहा गया है।
किंतु वे भगवान नहीं हैं। सब कुछ उनके वश में नहीं होता। मरीज के परिजनों को किसी ऑपरेशन के पहले लिखित रूप में देना होता है कि यदि कोई हादसा होता है तो इसके लिए हम जिम्मेदारी लेते हैं। कभी भी डॉक्टर गारंटी नहीं देता। यह उसकी कुशलता की कमी नहीं है बल्कि उसकी सीमा है क्योंकि जीवन देने वाला और लेने वाला परमात्मा है।
हां!अगर डॉक्टर किसी की बहुत गंभीर परिस्थिति के बावजूद जान बचाने में कामयाब हो जाता है तो उसको उतनी ही तृप्ति मिलती है जितना भक्त को भगवान के मिल जाने पर होती है।
अतः सुप्रीम कोर्ट का आदेश कि अस्पताल में मरीज की मौत होने पर डॉक्टर या अन्य स्टाफ पर 302 (हत्या) का केस दर्ज नहीं हो सकता 304 ए (लापरवाही) की ही धारा लगाई जा सकती है; बहुत ही तर्कसंगत और न्याययुक्त है।
इस गाइडलाइन की अनदेखी करके पुलिस ने भीड़ के दबाव में जो डॉक्टर अर्चना पर हत्या का केस दर्ज किया, और जिसके तनाव में आकर डॉक्टर ने आत्महत्या कर ली; उस पर भी गहराई से सोचने की जरूरत है।
जिस मरीज की इलाज के दौरान मौत हुई है, वह 22 वर्ष की उम्र में चौथी बार डिलीवरी के लिए आई। उसको 3 बेटियां थीं फिर भी बेटे की चाहत में यह पुरुष प्रधान समाज उसकी अंदरूनी दशा बद से बदतर करता चला गया। ऐसी स्थिति में किसी दुर्घटना के लिए "मरीज का परिवार कितना जिम्मेवार है? और डॉक्टर की जिम्मेवारी कितनी है??"; इस पर भी सभी को सोचना होगा।
एक तो डॉक्टर की संवेदनशीलता और उस पर से एक मां होने के नाते स्वयं के हृदय की ममता ने डॉ अर्चना का व्यक्तित्व कोमल फूल के समान बना दिया था।
भारी भीड़ के द्वारा डेड बॉडी रखकर प्रदर्शन करना, हत्या का आरोप लगाना और पुलिस के द्वारा 302 हत्या की धारा में केस दर्ज कर लेना; यह सब सीमा के पार चला गया। पत्थर और फूल के बीच संघर्ष हो तो पत्थर ही जीतेगा और फूल कुचला जाएगा।
एक तरफ यही समाज नवरात्रि के दौरान देवी के विभिन्न रूपों की पूजा करेगा और दूसरी तरफ साक्षात् देवियों को न डॉक्टर रूप में जीने देगा और न मां के रूप में।
लेकिन डॉक्टर अर्चना के साथ अपनी सारी सहानुभूतियों के बावजूद उनके **आत्महत्या के कदम का मैं समर्थन नहीं कर सकता** क्योंकि इतनी बड़ी प्रतिभा, इतना प्यार से भरा पूरा परिवार और इतना कर्तव्यनिष्ठ होने के बावजूद वो टूट गईं जबकि उनको तो ऊपर वाले पर और ज्यादा अटूट श्रद्धा रखनी चाहिए थी।
अच्छे लोगों पर जीवन में कई बेबुनियाद आरोप षड्यंत्र के तहत लगाए जाते रहे हैं और लगाए जाते रहेंगे, उनका सामना करने की हिम्मत रखना होगा। अन्यथा षड्यंत्रकारी-तत्त्व ही जीत जाएंगे।
महात्मा बुद्ध के जीवन का एक उदाहरण है।उनकी शिष्या सुंदरी को पैसे देकर भगवान बुद्ध पर शारीरिक संबंध रखने का आरोप लगवाया गया। सारी दुनिया में उनकी निंदा होने लगी और बुद्ध के शिष्यों को लोगों ने भिक्षा हेतु मांगने आने पर घरों से भगाना शुरू कर दिया। लेकिन बुद्ध सत्य के प्रकट होने का धैर्यपूर्वक इंतजार करते रहे। कुछ दिनों के बाद सुंदरी की हत्या षड्यंत्र करने वालों के द्वारा करा दी गई। अंत में षड्यंत्र करने वाले पकड़े गए और बुद्ध की कीर्ति-कौमुदी पहले से भी ज्यादा जगत में प्रसारित हो गई।
महान पुरुष के ऐसे दृष्टांत को प्रतिकूल परिस्थितियों में सत्य के हर एक राही को अवश्य स्मरण करना चाहिए।
किंतु डॉ अर्चना सम्यक्-स्मृति से चूक गईं।
राजनीतिक दबाव, धमकियां,फिरौती और मानसिक-हिंसारूपी पत्थरों ने मिलकर इस फूल को कुचल दिया लेकिन पत्थरों पर भी फूल ने जो अपनी सुगंध छोड़ी है,वह हवाओं के माध्यम से दूर तलक जाएगी।
उनका यह लिखना कि - "मैं अपने पति,मेरे बच्चों से बहुत प्यार करती हूं।कृपया मेरे मरने के बाद इन्हें परेशान न करना।"-
कितनी अद्भुत बात है। मरने के पल में भी अपनों की चिंता है। ऐसी सोच रखने वाली शख्सियत क्या किसी की जान ले सकती है? किंतु आशंका,भय और भावावेश में न उठाने वाला कदम उन्होंने उठा लिया।
एक विनती भी उनकी हम सभी के लिए बहुत ही विचारणीय है- don't harass innocent doctors please...
आज बढ़ती हुई भीड़तंत्र की प्रवृत्ति समाज और राष्ट्र के लिए घातक है। 99 लोगों के कह देने से कुछ सत्य नहीं हो जाता और अकेला पड़ जाने से कोई एक असत्य भी नहीं हो जाता।
सत्य और असत्य का निर्णय करने का तो हक उन्हें होना चाहिए जिनके पास हृदय की गहराई भी हो और मस्तिष्क की ऊंचाई भी हो।
निश्चितरूपेण व्यावसायिक जमाने में मरीज-डॉक्टर और शिष्य-गुरु के संबंधों में कुछ गिरावट आई है। संबंधों को पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है किंतु परस्पर श्रद्धा और विश्वास के परंपरागत आधार को पूर्णतया हटा देने से समाज और राष्ट्र गहरे खतरे में पड़ जाएगा।
आज के बाजार में हर वस्तु की अपनी कीमत है और हर सेवा का भी अपना शुल्क लिया जाता है। फिर भी चिकित्सा सेवा और शिक्षा सेवा ऐसी है कि वे बेशकीमती और अमूल्य है-
"जो भींग चुका हो वह भला किस बात से डरता
जो घर में खड़ा था उसे बरसात का डर था।
जिंसों का तो बाजार में बिकना था जरूरी
बाजार में बिकते हुए जज्बात का डर था।।"
विचारहीन और चरित्रहीन लोगों की भीड़ एकजुट होकर पुलिस को दबाव में ले लेती है और एक डॉक्टर को मरने पर मजबूर कर देती है तो हमें सोचना होगा कि हम भीड़तंत्र में जी रहे हैं या लोकतंत्र में?
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹