ईर्ष्या-द्वेष की आग के बीच नेत्रेश
April 5, 2022संवाद
"ईर्ष्या-द्वेष की आग के बीच नेत्रेश"
नवसंवत्सर, नवरात्र और रमजान के पवित्र अवसरों पर पवित्र आत्माएं चारों तरफ उत्साह और उमंग की अपनी ऊर्जा वातावरण में बिखेर देती हैं। इसके कारण अधिकतर लोग प्रेम और खुशी से भर जाते हैं।
दिव्य शक्तियों के उत्कर्ष को बढ़ता देखकर ऐसा लगता है कि आसुरी शक्तियां ईर्ष्या से भर जाती हैं। दानवों को अपना अस्तित्व मिटता दिखता है तो वे रंग में भंग डालने के लिए कोई न कोई योजना बना लेते हैं।
पथराव,आगजनी व आक्रमण की नकारात्मक खबरें सोशल मीडिया के द्वारा आजकल तेजी से फैलती हैं और लोगों में क्रिया-प्रतिक्रिया का दौर चालू हो जाता है।मुट्ठी भर लोगों की साज़िशें लाखों लोगों के शांतिपूर्ण अभियान को अशांति में बदल देती है।
किंतु नफरत के अंधेरों के बीच प्रेम का एक चिराग जल जाए तो काफी है।
राजस्थान के करौली में जिस जगह पर कुछ लोग हिंसा फैला रहे थे और आग लगा रहे थे तो उसी जगह पर एक पुलिस कांस्टेबल नेत्रेश शर्मा एक महिला और उसके बेटियों की रक्षा के लिए अपने को आग में झोंककर उनकी जिंदगी बचाने के लिए आगे आया। पवित्र दिवस के दिन दिव्य-शक्तियों ने नेत्रेश के माध्यम से अपना दिव्य-स्वरूप दिखाया। अन्यथा जलते हुए मकान में अनजानों के लिए घुसने का संकल्प और साहस उसे कहां से आया?
समाचारपत्रों ने भी प्रमुखता से उसकी खबर छाप कर एक बहुत ही सकारात्मक संदेश समाज को दिया है।
जिस समय में कुछ लोग नफरत के बीज बो रहे हैं, उसी समय में बहुत लोग प्रेम का पैगाम भी पहुंचा रहे हैं।
सामान्य जनता को जब सद्भाव का कोई संदेश देना हो और आपसी भाईचारा को बढ़ाना हो तो सृजनात्मक शक्तियों को विध्वंसात्मक शक्तियों से कई गुना ज्यादा प्रयास करने की जरूरत पड़ती है। क्योंकि खरपतवार अपने आप उग आते हैं लेकिन गुलाब को बड़े जतन से लगाना पड़ता है। जिन घरों को बनाने में बरसों लगते हैं,उनको आग लगाने वाले कुछ पलों में जला देते हैं-
"शामें जिंदगी की हो आई थी कच्चे घर बनाने में
वे तरस भी नहीं खाते बस्तियां जलाने में।।"
लेकिन बस्तियां जलाने वालों की अपनी जिंदगी बहुत पहले जल चुकी होती हैं। ऐसे असृजनशील लोगों के हाथों में धर्म की ठेकेदारी आ गई है। ऐसे लोगों के लिए धर्म बाहरी आडंबरों से ज्यादा कुछ भी नहीं होता। एक दूसरे से प्रतियोगिता में आगे निकलने की होड़ इनके बीच मची होती है। जिस धार्मिक-सत्ता की खोज शांति की थी,वह भी शक्ति की खोज में ही निकल पड़ा है। अतः ऐसी धार्मिक-सत्ता की राजनीतिक सत्ता के साथ मिलीभगत होती है। इस नापाक गठबंधन के कारण सामाजिक और सांप्रदायिक सौहार्द खतरे में पड़ जाता है।परिणामस्वरूप पवित्र अवसर अपवित्र हो जाता है।-
"दाढ़ियां और चोटियां टकराती हैं चौराहों पे
अमन और चैन का साया नहीं है इन राहों पे।"
लेकिन जिसके पास न दाढ़ी है और न चोटी है, किंतु वैसे नेत्रेश के पास सच्चा-धर्म है जो नफरत की आग में कूदकर प्रेम और अमन को बचा लाता है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹